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दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा क्यों नहीं मिल सकता why delhi is not considered as a state in hindi
why delhi is not considered as a state in hindi दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा क्यों नहीं मिल सकता ?
प्रश्न : ‘‘दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा सोच समझकर ही दिया जा सकता है।‘‘ इस संबंध में उचित टिप्पणी कीजिए।
– दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा दिलाने के लिए वर्तमान दिल्ली सरकार ने अभियान चलाने की घोषणा की है, परन्तु दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा सोच-समझकर ही दिया जाना चाहिए। अगर दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा दे दिया गया तो राज्य सूची के विषय (लोक व्यवस्था, पुलिस, भूमि) दिल्ली विधानसभा के अधीन हो जाएगी, दिल्ली पुलिस व दिल्ली विकास प्राधिकरण दिल्ली सरकार के अधीन हो जाएंगे। परन्तु दिल्ली देश की राजधानी है। अतः पुलिस व्यवस्था दिल्ली सरकार के हाथ में देना उचित नहीं है।
– दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा दे दिया जाए तो अगर दिल्ली सरकार केन्द्र सरकार के विरोधी राजनीतिक दल की हो तो केन्द्र को अपने कार्य संचालन में कठिनाई आयेगी।
– किंतु केन्द्र की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए कुछ विकेन्द्रिकरण किया जा सकता है, जैसे दिल्ली पुलिस के विभिन्न विभाग बनाये जा सकते है और स्थानीय मुद्दे व परिवहन जैसे विषय दिल्ली सरकार के अधीन किए जा सकते है। नई दिल्ली क्षेत्र को छोड़कर शेष दिल्ली के लिए भूमि जैसे विषय भी दिल्ली सरकार को सौंपे जा सकते है।
– दिल्ली सरकार द्वारा एक प्रशासनिक सुधार आयोग गठित किया जाए, जिसमें प्रशासन के विशेषज्ञा नियुक्त किए जाए।
– केन्द्र व दिल्ली की सरकारों के मध्य तनाव की स्थितियों से बचते हुए दिल्ली सरकार को कहाँ तक शक्तियों का हस्तांतरण किया जा सकता है। इस बात की समीक्षा की जाए।
अतः दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा देने की बजाय, उसकी शक्तियों में कुछ हद तक वृद्धि की जानी चाहिए।
1. ‘‘सिविल सोसाइटी का प्रभावी होना, लोकतंत्र को मजबूत व व्यापक बनाता है।‘‘स्पष्ट कीजिए।
सिविल सोसायटी नागरिक समाज सभ्य, जागरूक और उत्तरदायी व्यक्तियों का समूह है। नागरिक समाज प्रगतिशील तथा स्वतंत्र समाज होता है। यह बौद्धिक रूप से उन्नत होता है, तथा राजनीतिक व प्रशासनिक मामलों में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
नागरिक समाज लोकतंत्र को मजबूत बनाए रखने में महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा करता है। इसके द्वारा सत्ता की निरंकुशता पर रोक लगाया जाता है। नागरिक समाज जनमत निर्माण कर लोगों की इच्छाओं को राज्य तक ले जाता है।
– यह समानता आधारित सार्वजनिक कल्याण को प्रेरित करता है।
– प्रशासन में जनसहभागिता का विकास करता है।
– आर्थिक-सामाजिक रूप से पिछड़े व्यक्तियों-समुदायों के विकास हेतु प्रयत्नशील रहता है।
– जनता को सरकारी योजनाओं तथा, सरकार को जनसमस्याओं से अवगत करवाता है।
– प्रशासनिक मशीनरी पर सामुदायिक जवाबदेही प्रणाली लागू करते है, इससे प्रशासन की निरंकुशता और भ्रष्टाचार पर रोक लगती है।
– स्थानीय विकास के लिए स्थानीय संशोधनों के दोहन को सुनिश्चित करने में मदद करते है। इससे सामुदायिक आत्म निर्भरता
का विकास होता है।
– स्थानीय शासन को सशक्त बनाते है, स्थानीय स्तर पर सार्वजनिक पहरेदार है।
– जनता में राजनीतिक प्रशासनिक चेतना उत्पन्न करते है। जनता की माँगों को संगठित करते है।
– परस्पर सहायता द्वारा आत्मसहायता के सहकारी सिद्धांत को पुष्ट करते है। लोगों के मध्य जागृति उत्पन्न कर लोकतंत्र को
मजबूती प्रदान करते है।
2. अनुच्छेद 35। के संबंध में चल रही चर्चाओं की व्याख्या करें।
अनुच्छेद 35। संविधान में 1954 में एक राष्ट्रपतीय आदेश के माध्यम से जोड़ा गया था। यह जम्मू-कश्मीर की विधानसभाओं को यह विशेषाधिकार देता है कि वह यह तय कर सके कि वहाँ के ‘स्थायी निवासी‘ कौन होंगे और उन्हें क्या-क्या अधिकार प्राप्त होंगे। इस कानून के अनुसार स्थायी निवासियों को ही विधानसभा में चुनाव लड़ने या मतदान करने की अनुमति है। इसके अलावा कोई व्यक्ति न तो वहाँ संपत्ति खरीद सकता है, ना ही स्थायी रूप से बस सकता है. ना ही वहाँ राज्य की सरकारी नौकरी मिल सकती है।
हालिया में सुप्रीम कोर्ट में एक एन.जी.ओ. द्वारा याचिका दायर कर अनुच्छेद 35। को निरस्तर करने की मांग की गई है। कोर्ट ने इस याचिका को स्वीकार करते हुए जम्मू-कश्मीर राज्य सरकार व केन्द्र सरकार को अपना पक्ष रखकर विस्तृत समीक्षा करने का अनुरोध किया है।
अनुच्छेद 35। का समर्थन करने वाले लोग कहते है। इससे राज्य की स्वतंत्रता में कमी आ जाएगी, जो आजादी के समय किए गए वादे के खिलाफ है। इस अनुच्छेद के हटने के बाद जम्मू-कश्मीर पर केन्द्रीय नियंत्रण में वृद्धि जाएगी। एक अन्य आशंका यह भी है कि इसके हटने से अन्य राज्यों के लोग यहाँ बसेंगे तो मुस्लिम बहुल क्षेत्र की जनांकिकीय संरचना बदल जाएगी।
अनुच्छेद 35। को हटाने वाले कहते है कि यह अनुच्छेद 368 के तहत संशोधन किए बिना ही जोड़ा गया है। यह संसद के सामने भी पेश किया गया। अतः इसकी संवैधानिकता संदिग्ध है। राज्य को स्थायी निवासी की पहचान करने संबंधी अधिकार देने से कश्मीर के अनेक वर्गों को भेदभाव का सामना करना पड़ रहा है।
4. ‘अन्य पिछड़ा वर्ग आयोग‘ को प्राप्त होने वाली संवैधानिक स्थिति व इससे होने वाले बदलावों की चर्चा कीजिए।
प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में केन्द्रीय मंत्रिमंडल ने अन्य पिछड़ा वर्ग आयोग के कार्यकाल अंतिम रूप से वर्तमान 20 जून, 2018 से बढ़ाकर 31 जुलाई, 2018 कर दिया है।
संवैधानिक स्थिति-
– लोकसभा ने 123वें संविधान संशोधन विधेयक के तहत ‘राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग‘ (निरसन) विधेयक, 2017 पारित किया था। – इसके अंतर्गत संविधान में एक नया अनुच्छेद 338 B शामिल किया जाएगा, जिसके तहत पिछड़े वर्ग के गठन अधिकारियों की व्यवस्था की जाएगी।
– इस विधेयक का मूल उद्देश्य राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग को संवैधानिक दर्जा देना था।
– नए अनुच्छेद 342 । जोड़कर संसद कानून बनाकर पिछड़े वर्गों की केन्द्रीय सूची से वर्गों को भीतर या बाहर कर सकती है।
– वर्तमान में राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग एक संवैधानिक निकाय है।
– पिछड़ा वन आयोग को संविधान में स्थान मिलने पर यह राष्ट्रपति को शक्ति देगा कि वह राज्य व संघीय क्षेत्र के समाजिक व शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्गों की सूची को अधिसूचित कर सके। राज्य के मामले में राज्यपाल के साथ परामर्श के बाद ऐसी अधिसूचना दे सकेगा।
– संवैधानिक स्थिति प्राप्त होने पर राज्य सरकार, राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग, पिछड़ा वर्ग व समुदाय से जुड़े जनसाधारण के हितों पर व्यापक रूप से विचार विमर्श किया जा सकेगा।
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