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Categories: sociology

दंड के निरोधात्मक एवं सुधारात्मक सिद्धांत की व्याख्या कीजिए , सुधारात्मक दंड सिद्धांत किसे कहते हैं

सुधारात्मक दंड सिद्धांत किसे कहते हैं दंड के निरोधात्मक एवं सुधारात्मक सिद्धांत की व्याख्या कीजिए कितने प्रकार के होते हैं कौन-कौन से हैं का अर्थ और परिभाषा क्या है ?
दंड और इसका नैतिक औचित्य (Punishment and its Ethical Justification)
दंड का अवसर तब आता है जब किसी नियम को चेतनापूर्वक भंग किया जाए। अच्छे या शुभ कर्मों के लिए व्यक्ति को पुरस्कार तथा बुरे या अशुभ कर्मों के लिए दंड की व्यवस्था प्राचीन काल से चली आ रही है। हम कर्म की ओर अग्रसर होते पुरस्कार पाने के लिए तथा बुरे कर्मों से दूर रहते हैं दंड या सजा से बचने के लिए।
जहां तक दंड को नैतिक रूप से उचित या अनुचित करार देने का प्रश्न हैं तो इस संबंध में कुछ विचार द्रष्टव्य है। दंड का पहला आधार है ऐच्छिक कर्म। यदि अंजाने में या इच्छा के विरुद्ध अज्ञानता के कारण किसी व्यक्ति के द्वारा किसी नियम का उल्लंघन हो जाए तो उसे अशुभ या अपराध नहीं माना जा सकता और इसलिए वह दंडनीय भी नहीं होता। अतः दंड के लिए यह आवश्यक है कि जो व्यक्ति जिस कर्म के लिए दंडित होता है उसे उसने इच्छापूर्वक संकल्प करके किया हो। संकल्प-स्वातंत्र्य दंड की एक आवश्यक मान्यता है।
दंड के लिए यह भी आवश्यक है कि दंड देने वाला कोई व्यक्ति या संस्था हो। ऐसे व्यक्ति या संस्था को भी विवेकयुक्त होना आवयश्क है। यदि ऐसा नहीं हो तो दंड न्यायोचित नहीं होगा। दंड के लिए यह भी आवश्यक है कि समाज के कुछ नियम हों, क्योंकि यदि नियम नहीं होंगे तो उल्लंघन किसका होगा? नियमों का चेतन पूर्वक उल्लंघन अपराध है और दंडनीय भी अर्थात् दंड प्रदान करने के लिए भी नियमों की आवश्यकता है। दंड का तीसरा मुख्य आधार है न्याय की अवधारणा। यदि किसी व्यक्ति ने कोई अपराध किया तो उसे दंडित क्यों होना चाहिए? दंड देने का आधार न्याय की अवधारणा है। अतः दंड न्यायोचित होता है।

दंड के सिद्धान्त (Theories of Punishment)
दंड के विषय में तीन मत प्रचलित है-
ऽ निवर्तनवादी सिद्धान्त के अनुसार दंड का लक्ष्य है कि कोई फिर से अपराध न करे और भविष्य में वह अपराध रुक जाए। इसके अनुसार दंड देने से अपराध का निवर्तन होता है अर्थात् रुक जाता है।
ऽ प्रतिकारवाद का सिद्धान्त इस धारणा पर आधारित है कि प्रत्येक क्रिया को उसी अनुपात में प्रतिक्रिया होती है। अतः किसी व्यक्ति ने जिस अनुपात में कोई अपराध किया है तो उसे उसी अनुपात में प्रतिक्रिया होती है। अतः किसी व्यक्ति ने जिस अनुपात में कोई अपराध किया है तो उसे उसी अनुपात में दंडित करना प्रतिकारवाद है।
ऽ दंड के सुधारवादी सिद्धान्त के अनुसार दंड का लक्ष्य अपराधी को शिक्षित करना है। अतः दंड का लक्ष्य प्रतिकार नहीं, उपयोगिता है।
अतः दंड के इन तीनों सिद्धान्तों का अपना मौलिक आधार है। प्रथम सिद्धान्त जनकल्याण पर आधारित है, द्वितीय का मत यह है कि इससे अपराध की मात्रा व संख्या में कमी आएगी तथा तीसरा इस तथ्य पर आधारित है कि अपराधी में नैतिकं सुधार आएगा।

निवर्तनवादी सिद्धान्त (Deterrent or Prerentive Theory of Punishment)
जरेमी बंधम इस सिद्धान्त के पोषक व समर्थक हैं। इस सिद्धान्त के अनुसार किसी अपराधी को सजा देने का यह लक्ष्य रहता है कि उस अपराध की पुनरावृत्ति उस अपराधी या अन्य व्यक्ति द्वारा न हो। एक न्यायाधीश के शब्दों में दंड का लक्ष्य इस प्रकार रखा जा सकता है- ‘‘तुम्हें भेड़ चुराने के लिए दंडित नहीं किया जाता, बल्कि इसलिए कि भेड़ की चोरी न हो‘‘। अतः सजा देने का मुख्य लक्ष्य है कि भविष्य में इन घटनाओं की पुनरावृत्ति न हो। इसी प्रकार, शुभ कर्मों के लिए पुरस्कार देना चाहिए, ताकि भविष्य में इन कर्मों से प्रेरणा मिले। इस मत की मान्यता यह है कि शारीरिक या मानसिक कष्ट के रूप में दंड देने से अपराधी तथा अन्य लोगों में भय का संचार होता है। अतः भविष्य में उस कर्म को नहीं करने की प्रेरणा मिलती है। इससे अपराधी तथा समाज के अन्य लोगों में उस अपराध को नहीं करने की प्रवृत्ति उत्पन्न होती है।

प्रतिकारवाद (Retributive Theory)
अरस्तु और हीगेल यह मानते हैं कि अपराधी को अवश्य दंड मिलना चाहिए, क्योंकि यह उसका ऋणात्मक पुरस्कार है। प्रतिकारवाद के अनुसार दंड एक न्यायोचित व्यापार है। दंड का लक्ष्य नैतिक नियम की उच्चता तथा प्रभुता की रक्षा और दोषी को दंडित करना है। जब कोई अपराधी नैतिक नियमों का उल्लंघन करता है, तब उसे सजा मिलनी चाहिए और नैतिक नियमों की प्रतिष्ठा एवं प्रभुता कायम रहनी चाहिए। नैतिक नियम सर्वोच्च प्रभुसत्ता है। इसलिए इसे भंग करनेवाला निश्चित रूप से दंड का अधिकारी है। यदि अपराधी को सजा नहीं दी जाती, तो इससे नैतिक नियमों की प्रभुसत्ता और गरिमा पर आंच आती है। इसीलिए हीगल एवं अरस्तु ने इसे ऋणात्मक पुरस्कार माना है।

सुधारवादी सिद्धान्त (Reformative or Educative Theory of Punishment)
जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है, इस सिद्धान्त के अनुसार अपराधी को प्रतिकार की भावना से सजा नहीं दी जाती, बल्कि उसे सुधारने के लिए दी जाती है। यहां दंड का लक्ष्य समाज का सुधार नहीं, बल्कि उस अपराधी को सुधारना है, जिसने कोई अनुचित कार्य किया है। अपराधी को उसके हित में दंड दिया जाता है, दूसरों के हित में नहीं। प्रत्येक अपराध के कुछ कारण अवश्य होते हैं। यदि इन कारणों को हटा दिया जाए, तो व्यक्ति पुनः अपराध नहीं कर सकता।
पारम्परिक तौर पर प्लेटो को इस मत का प्रणेता माना जाता है। प्लेटो के अनुसार –
ऽ अपराधी और राज्य का संबंध अभिभावक और पुत्र का संबंध है। यहां अभिभावक का अर्थ है माता-पिता।
ऽ दुष्टता एक मानसिक रोग है।
ऽ दंड अपराध के लिए नैतिक दवा (इलाज) के समान होता है। दंड भले ही बहुत प्रासंगिक न हो परन्तु यह अपरिहार्य है।

लोक सेवा में सिविल सेवा मूल्य तथा नीतिशास्त्र
लोक प्रशासन (Public Administration)
लोक प्रशासन सरकार की कार्यपालिका शाखा का प्रतिनिधित्व करता है। यह मूलतः सरकारी गतिविधियों के प्रभावकारी निष्पादन से संबंधित तंत्र और उसके प्रावधानों का अध्ययन है। प्रशासन की परिभाषा कुछ सामान्य लक्ष्यों की प्राप्ति हेतु किए गए सहकारी, मानवीय प्रयासों के रूप में दी जाती है। लोक प्रशासन, प्रशासन का वह प्रकार है जो एक विशेष राजनीतिक व्यवस्था में संचालक का काम करता है। यही वह साधन है जो नीति निर्माताओं द्वारा किए गए नीतिगत निर्णयों और कार्य संपन्न करने की पूरी योजना के बीच संबंध स्थापित करता है।
लोक प्रशासन का काम उद्देश्यों और लक्ष्यों को निर्धारित करना, विधायिका तथा नागरिक संगठनों का समर्थन प्राप्त करने के लिए उन्हें साथ लेकर काम करना, संगठनों की स्थापना करना तथा उनका पुनरावलोकन करना, कर्मचारियों को निर्देश देना एवं निरीक्षण करना, नेतृत्व प्रदान करना आदि है। यह वह साधन है जिसके द्वारा सरकारी उद्देश्यों और लक्ष्यों को वास्तविक रूप प्रदान किया जाता है।
लोक प्रशासन से जुड़ा हुआ ‘लोक‘ शब्द इस अध्ययन शाखा को खास विशेषताएं प्रदान करता है। इस शब्द को सामान्यतः सरकार के रूप में समझना चाहिए। अतः लोक प्रशासन का अर्थ हुआ सरकारी प्रशासन। इसमें नौकरशाही पर विशेष बल दिया जाता है। सामान्य बातचीत में लोक प्रशासन से यही अर्थ लगाया जाता है। यदि ‘लोक‘ शब्द का व्यापक अर्थ लगाया जाए तो ऐसा कोई भी प्रशासन जिसका ‘लोक‘ पर व्यापक प्रभाव पड़ता हो, इस अध्ययन-शाखा की सीमा के अंतर्गत माना जाएगा।
नौकरशाही के कार्यों को विस्तृत करने के क्रम में सरकार के बढ़ते हुए महत्व के कारण लोक प्रशासन बहुत ही ज्यादा जटिल और विशेषीकृत होता जा रहा है।

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