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चोलकालीन स्थापत्य कला क्या है | चोल कालीन स्थापत्य कला के दो प्रमुख उदाहरण दीजिए Architecture of Chola Period
चोल कालीन स्थापत्य कला के दो प्रमुख उदाहरण दीजिए चोलकालीन स्थापत्य कला क्या है | भारतीय कांस्य मूर्तिकला परंपरा चोल काल में अपने चरमोत्कर्ष पर था, चर्चा करें।
चोलकालीन स्थापत्य (Architecture of Chola Period in hindi)
दक्षिण में जिस कला को पांड्य और पल्लव शासकों ने जन्म दिया, उसे चोल शासकों ने उत्कर्ष पर पहुँचाया। उन्होंने अपने चार सदियों के शासनकाल में राज्य में बड़ी मात्रा में मंदिर बनवाये। उनकी कला का अनुकरण पड़ोसी राज्यों एवं देशों तक में किया गया। चोलों ने मंदिरों के निर्माण के लिए ईंटों की जगह पत्थरों और शिलाओं का प्रयोग किया। इस काल के मंदिरों की आकार बहुत विशाल है और इनका प्रयोग धार्मिक कार्यों के अलावा सामाजिक, सांस्कृतिक और शैक्षणिक प्रयोजनों के लिए भी होता था। इसलिए शासकों ने इन मंदिरों के कामकाज को सुचारु रूप से चलाने के लिए अनुदान दिये। चोल क़ला को अध्ययन की सुविधा के लिए दो भागों में बांटा गया है। पहले भाग में दसवीं सदी तक निर्मित चोल मंदिर जैसें तिरुकटलाई का सुंदरेश्वर मंदिर, कन्नूर का बालसुब्रह्मण्यम मंदिर, नरतमालै का विजयालथ मंदिर और कदम्बर-मलाई मंदिर आदि मंदिर रखे गये हैं. जबकि दूसरे भाग का युग तंजावुर के वृहदेश्वर मंदिर के निर्माण के साथ शुरू होता है। दो गोपुरम वाले इस मंदिर में बीचोबीच गर्भगृह, चारों ओर प्रदक्षिणा पथ और काफी ऊँचा विमान बनाया गया है। गर्भगृह में विशाल शिवलिंग है जिसे वृहदेश्वर कहा गया हैं। संपूर्ण मंदिर में अंदर और बाहर कई प्रकार को मूर्तियाँ उकेरी गई हैं। इसी मंदिर की अनुकृति पर गंगैकोंडचोलपुरम में एक शिव मंदिर बनवाया। इन दोनों मंदिरों के अलावा दारासुरम का ऐरावतेश्वर और त्रिभुवनम का कम्पहरेश्वर मंदिर भी सुंदर एवं भव्य हैं।
चोल कला का एक महत्त्वपूर्ण पक्ष मूर्ति निर्माण है। इस काल में विभिन्न देवी-देवताओं की धात या कांसे की मूर्तियों का निर्माण बड़ी संख्या में किया गया। चोलयुगीन मूर्तियों में नटराज या नृत्य करते शिव की प्रतिमा कांस्य प्रतिमाओं में सर्वाेत्कृष्ट मानी गई हैं। इनके अलावा पार्वती, स्कंदकार्तिकेय, गणेश आदि को असंख्य मूर्तियों का निर्माण किया गया। चोलयुगीन नटराज की मूर्तियों को चोलकला का सांस्कृतिक निष्कर्ष कहा गया है।
राष्ट्रकूटकालीन स्थापत्य (Architecture of Rashtrakuta Period)
राष्ट्रकूट युग के स्थापत्य में महाराष्ट्र के औरंगाबाद में एलोरा नामक स्थल और मुंबई के निकट द्वीपीय स्थल एलीफैंटा की गुफाएँ सर्वाधिक उल्लेखनीय हैं।
विश्व विरासत स्थलों की सूची में शामिल एलोरा गुफाओं का स्थापत्य भारतीय शैली के तहत प्रस्तर काट कर बनाए गये स्थल का बेहतरीन नमूना है। यहाँ बनीं 34 गुफाओं में से 17 गुफाएं हिन्दू 12 गुफाएं बौद्ध और पाँच गुफाएँ जैन धर्म को समर्पित हैं। यहाँ अधिकतर बौद्ध विहार बने हैं। इनमें महात्मा बुद्ध बोधिसत्व और अन्य बौद्ध महात्माओं की प्रतिमाएं उकेरी गायीं हैं। इनमें हुआ नक्काशी का काम, लकड़ी पर उकेरी गई नक्काशी की तरह बारीक़ है। इनमें सबसे प्रसिद्ध दसवीं बौद्ध गुफा है जिसे चंद्रशाला या विश्वकर्मा गुफा या बढ़ई गुफा भी कहा गया है। इनके अलावा पांचों जैन गुफाएँ दिगम्बर संप्रदाय को समर्पित है। इनमें छोटा कैलाश, इंद्रसभा और जगन्नाथ सभा को ज़्यादा प्रशंसा मिली है। एलोरी की शुफ़ाओं की प्रसिद्धि हिन्दु धर्म को समर्पित साफाओं को लेकर ज्यादा है। इनमें कैलाश गुहा मंदिर (गुफा संख्या-16) की गणना विश्व स्तर की भव्यतम कलाकृतियों में की जाती है। इनके तीन ते हैं मंडप कक्ष और गर्भगृह। गर्भगृह में रखे गये शिवलिंग को घुश्मेश्वर भी कहा गया है। इसके गलीयारों में भी शिव और विष्णु की अनेक प्रतिमाएँ मिलती हैं। इसकी तुलना एथेंस के प्रसिद्ध मंदिर ‘पार्थेनन‘ से की गई है। इनके अलावा दशावतार गुफा, अलावा दशावतार गुफा, रामेश्वर गुफा, नीलकंठ गुफा, गोपी गुफा, सूर्य देवता वाली कुंभखाँडा गुफा, सीता की नहानी गुफा भी प्रसिद्ध हैं। इस परिसर में दो ध्वज लगे स्तंभ भी प्रस्तर पर उकेरे गये।
विश्व विरासत में शामिल एलीफैंटा में मिली गुफाओं में अधिकतम हिन्दू धर्म को और शेष बौद्ध धर्म को समर्पित हैं। एलीफैंटा द्वीप पर स्थित इन गुफाओं में शैव मतावलम्बियों का महत्त्वपूर्ण स्थान है, क्योंकि शिव के विभिन्न रूपों वाली कई अदभुत प्रतिमाएँ यहाँ मौजूद हैं। इन गुफाओं के निर्माताओं में शिलाहार शासकों और राष्ट्रकूट शासकों दोनों का नाम आता है। कोंकणी मौर्याे के समय तक इस द्वीप को घारापुरी कहा जाता था। बाद में पुर्तगालियों ने यहाँ एक हाथी की विशाल प्रतिमा मिलने से इसे एलीफैंटा कहा। एलीफैंटा गुफाओं को इस तरह से गढ़ा गया था कि प्रतिमाओं समेत साठ हजार वर्ग फुट में फैला समूचा परिसर ही दर्शनीय है। चट्टानों को काट-काटकर अन्दर की जगह, बारीक काम वाले स्तम्भ और दीवारों पर मूर्तियाँ उकेरी गईं और गलियारे एवं कक्ष बनाये गये। यहाँ शिव की ज्यादातर प्रतिमाएँ आदमकद या उससे भी बड़ी हैं। पूर्वी व पश्चिमी द्वारों को जोड़ने वाले गलियारे में 20 स्तंभ हैं। एलीफैंटा में बनी त्रिमूर्ति विश्व प्रसिद्ध है। यद्यपि हिंदू धर्म में त्रिमूर्ति का आशय ब्रह्मा, विष्णु, महेश से है पर यहाँ बनी, त्रिमूर्तियाँ शिव के ही तीन रूपों की हैं। एक चेहरे में शिव को उत्तेजक होठों वाले युवा के रूप में दिखाया गया है। यह छवि सृष्टि के रचयिता ब्रह्मा की है दूसरा चेहरा गुस्से वाले मूंछधारी युवा का है। यह छवि विनाशक रुद्र से मिलती है। तीसरा चेहरा जो मध्य में है, वह पालक सरीखे शान्त और ध्यानमग्न व्यक्ति का है। यह विष्णु की छवि दर्शाता है। यानी पारम्परिक रूप से जो छवियाँ ब्रह्मा, विष्णु और महेश की रही हैं, वे तीनों छवियाँ शिव के ही रूपों में दिखाई गई हैं। इनके अलावा एलीफैंटा गुफाओं की दक्षिण दीवार पर कल्याणसुंदरा, गंगाधरा, अर्द्धनारीश्वर व उमा-महेश्वर के रूप में शिव की प्रतिमाएँ हैं। उत्तरी प्रवेश द्वार के बाई ओर नटराज और दायीं ओर योगीश्वर के रूप में भी शिव की मूर्तियाँ हैं। यहाँ महेश शिवलिंग के रूप में भी हैं और विभिन्न रूपों में भी। मुख्य मन्दिर के पूरब में एक अन्य मन्दिर के कक्ष में शिव पुराण से जुड़ी कहानियाँ दर्शाई गई हैं।
पल्लवकालीन स्थापत्य
पल्लव शासकों का काल कला एवं स्थापत्य के लिए बहुत प्रसिद्ध है। उनकी कला वास्तव में भारतीय कला के सर्वाधिक गौरवशाली अध्यायों में शामिल है। पल्लव कला के विकास की शैलियों को हम क्रमशः महेंद्र शैली (610-640 ई.) मामल्ल शैली (640-674 ई.) और राजसिंह शैली (674-800 ई.) में अलग-अलंग देख सकते हैं।
‘महेंद्र शैली‘ में प्रस्तर काट कर गुफा मंदिरों (Rock cut temple) का निर्माण किया गया। इन्हें मंडप कहा गया। ये मंडप खंभों वाले बरामदे हैं और जिनके दूसरे सिरे पर गर्भगृह बनाया गया है। इन मंडपों में मंडगपटु का त्रिमूर्ति मंडप. महेंद्रवाड़ी का महेंद्रविष्णु गृहमंडपम, मामंडूर का विष्णुमंडप, त्रिचुरापल्ली का ललितांकुर ग्रहमंडप विशेष उल्लेखनीय हैं। ‘मामल्ल शैली‘ में मंडप के अलावा एक ही पत्थर या एकाश्मक (Monolithic) मंदिर या रथ बनाये गये। स्थापत्य कला के ये नमूने मामल्लपुरम (तमिलनाडु के जिला कांचीपुरम में महाबलीपुरम) में हैं। इनमें आदि-वाराह, महिषमर्दिनी, पंचपांडव, रामानुज आदि मंडप विशेष प्रसिद्ध हैं। इन मंडपों में उकेरे गये महिषमर्दिनी, अनंतशायी विष्णु, त्रिविक्रम, ब्रह्मा, गजलक्ष्मी. हरिहर आदि की मूर्तियाँ प्रशंसनीय हैं। मामल्लपुरम मंडपों को. अपेक्षाकृत अपने रथ मंदिरों के लिए जाना जाता है। ये रथमंदिर मूर्तिकला का सुंदर उदाहरण प्रस्तुत करते हैं। इन्हें कठोर चट्टान काट कर बनाया गया है। इनमें प्रमुख रथ मंदिर के नाम हैं- द्रौपदी रथ, नकुल-सहदेव रथ, अर्जुन रथ, भीम रथ, गणेश रथ, पिडारि रथ तथा वलैयंकुटटै रथ। इनमें नकुल-सहदेव के रथ के अलावा अन्य सभी रथों पर दुर्गा, इंद्र, शिव, गंगा, पार्वती ब्रह्मा, आदि की मूर्तियाँ उत्कीर्ण की गई हैं। इन रथों को सप्त पैगोडा भी कहा गया है। पल्लव कला की अंतिम एवं महत्त्वपूर्ण ‘राजसिंह शैली‘ में एक विशेष परिवर्तन यह हुआ कि गुफा मंदिरों के स्थान पर पत्थर, ईंट आदि की सहायता से मंदिरों का निर्माण किया जाने लगा। इस शैली के तीन उदाहरण महाबलीपुरम के तटीय मंदिर (Shore Temple) ईश्वर मंदिर और मुकुंद मंदिर हैं। इनके अलावा उत्तरी अर्काट का पनमलाई कांची का कैलाशनाथ और बैकुंठ पेरुमलं का मंदिर भी उल्लेखनीय है। इनमें तटीय मंदिर अद्भूत शिल्पकारी का नमूना है। इसकी दीवारों पर गणेश, स्कंद, गज आदि की मूर्तियाँ उकेरी गईं हैं। इन तीन प्रमुख शैलियों के अलावा चैथे प्रकारः की ‘नंदीवर्मन शैली‘ (800-900. ई.) के भी उदाहरण मिलते हैं। इनमें मुक्तेश्वर मंदिर, मातंगेश्वर मंदिर, वड्मल्लिश्वर, वीरट्टानेश्वर मंदिर, परशुरामेश्वर मंदिर प्रमुख उदाहरण हैं।
सल्तनत कालीन स्थापत्य (Architecture of Sultanate Period)
सल्तनत काल में भारतीय तथा इस्लामी शैलियों की विशेषताओं से युक्त स्थापत्य का विकास हुआ, इसलिए इस युग की शैली को ‘हिन्दू-इस्लामी या इण्डो इस्लामिक‘ या ‘इण्डो-सासनिक शैली कहा गया है। इसकी विशेषताएँ निम्नलिखित हैंः
1. सल्तनत काल की स्थापत्य कला में भारतीय एवं ईरानी शैलियों के मिश्रण के प्रमाण मिलते हैं।
2. इस युग में किला. मकंबरा, मस्जिद, महल एवं मेहराब-गुम्बद तथा संकरी एवं ऊँची मीनारें बड़ी संख्या में बनाई गईं।
3. इस काल के शुरुआती दौर में मंदिरों के अवशेष और उनकी सामग्री की मदद से निर्माण कार्य किया गया। ।
4. सल्तनत काल में सुल्तानों, अमीरों एवं सूफियों के मकबरों के निर्माण की परम्परा की शुरुआत हुई।
5. इस काल में ही इमारतों की मजबूती हेतु पत्थर और गारे में अच्छे किस्म के चूने का प्रयोग किया गया।
6. सल्तनत काल में इमारतों में पहली बार वैज्ञानिक ढंग से मेहराब एवं गुम्बद का प्रयोग मिलता है। यह भारतीय कला में अरबी प्रभाव को दर्शाता है। तुर्क सुल्तानों ने गुम्बद और मेहराब के निर्माण में भारतीय शिला एवं अरबी शहतीर, दोनों प्रणालियों का उपयोग किया।
7. सल्तनत काल में इमारतों को साज-सज्जा में जीवित वस्तुओं का चित्रण निषिद्ध होने के कारण उन्हें सजाने में अनेक प्रकार की फूल-पत्तियाँ; ज्यामितीय आकृति एवं कुरान की आयतें खुदवायी जाती थीं। कालान्तर में तुर्क सुल्तानों द्वारा हिन्दू साज-सज्जा की वस्तुओं जैसे- कमलबेल के नमून, स्वास्तिक, घंटियों के नमूने, कलश आदि का भी प्रयोग किया जाने लगा।
8. सल्तनत कालीन स्थापत्य सरकारी प्रश्रय और पोषण की उपज हैं। इसलिए इस कला में सुल्तान की पसंदगी और नापसंदगी साफ दृष्टिगोचर होती है।
सल्तनत काल के तहत आने वाले गुलाम वंश में बनी कुछ प्रमुख इमारतों का वर्णन इस प्रकार है-
कुव्वतुल इस्लाम मस्जिद (Quwwat-ul-Islam Mosque)
कुतुबुद्दीन ऐबक ने दिल्ली विजय के उपलक्ष्य में तथा इस्लाम धर्म को प्रतिष्ठित करने के उद्देश्य से 1192 ई. में ‘कत्ब‘ अथवा कुव्वतुल इस्लाम या ‘कुव्वत-उल-इस्लाम मस्जिद‘ का निर्माण एक समकोण चबूतरे पर करवाया। यह दिल्ली सल्तनत द्वारा निर्मित सबसे पहली मस्जिद है। इसमें एक आयताकार प्रांगण है जो चारों ओर से छतों द्वारा घिरा हआ है। यह कुेतबद्दीन ऐबक द्वारा ध्वस्त किए गए 27 हिंद और जैन मंदिरों के तराशे गए स्तंभों और स्थापत्य खंडों के ऊपर टिका है। प्रांगण में स्थित लौह स्तंभ पर चैथी शताब्दी की ब्राह्मी लिपि में एक अभिलेख मौजूद है जिसके अनुसार चंद्राजाम के शक्तिशाली राजा की स्मृति में विष्णुपद नामक एक पहाड़ी पर इस स्तंभ की स्थापना भगवान विष्णु के ध्वज के रूप में की कई थी। अलंकृत शीर्ष के ऊपर एक. गहरा खोल यह दर्शाता है कि संभवतया इसमें गरूड़ की प्रतिमा स्थापित थी। इस स्तंभ को ‘जनमानस अनेरापाल की किल्ली‘ भी कहते हैं। इस लौह स्तंभ पर सदियों बाद भी जंग नहीं लग सकी है जो तत्कालीन उच्च कोटि के धातु विज्ञान की जानकारी को दर्शाता है। सन् 1230 ई. में इल्तुतमिश ने मस्जिद के प्रांगण को दोगुना कराया। अलाउद्दीन खिलजी ने इस मस्जिद का विस्तार कराया तथा कुरान की आयतें लिखवाई। इस मस्जिद में सर्वप्रथम इस्लामी स्थापत्य कला की मजबूती एवं सौन्दर्य जैसी विशेषताओं की उभारा गया।
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