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ग्वालियर किले का इतिहास क्या है ? ग्वालियर का किला किसने बनवाया था पुराना नाम जानकारी कहां है
ग्वालियर का किला किसने बनवाया था पुराना नाम जानकारी कहां है ग्वालियर किले का इतिहास क्या है ? gwalior fort history in hindi
ग्वालियर (Gwalior)
राजा मानसिंह तोमर ने ग्वालियर के किले को 15वीं शताब्दी में एक पहाड़ी पर चाहरदीवारी से युक्त बनवाया था। किले में प्रवेश के दो रास्ते हैं। पूर्वी दिशा में पैदल योग्य रास्ता ग्वालियर दरवाजा और दूसरा पश्चिमी दिशा में बना उर्वई द्वार है जहाँ वाहन से पहुँचा जा सकता है। किले में जैन तीर्थंकरों की मूर्तियाँ पत्थर काटकर बनाई गई हैं। इसके उत्तरी सिरे पर जहाँगीरी महल शाहजहाँ महल, करना महल, विक्रम महल और जल जौहर कुंड है। जहाँगीरी महल और शाहजहाँ महल मुगल वास्तुशैली पर आधारित हैं। किले की एक प्रसिद्ध इमारत मान मंदिर महल है। इस महल के दो खुले प्रांगण हैं जो कक्षों से घिरे हैं। इन कक्षों के निर्माण में पत्थरों, स्तम्भों और ब्रेकेट का प्रयोग हुआ है। मोर व अन्य पक्षियों की चित्रकारी से सजावट के कारण इस महल को चित्र मंदिर और चित्रकारी के महल के नाम से भी जाना जाता है। यह महल पच्चीकारी और नक्कासी का बेहतरीन नमूना है। खूबसूरत पत्थरों की चित्रपट्टी में संगीत भी गूंजता था। किले में इसके अलावा सास बहू का मंदिर, तेलंगाना या तेली मंदिर, जसविलास महल आदि इमारते हैं। किले में बना गुजरी महल विशिष्ट है। इसे 15 शताब्दी में राजा मानसिंह ने अपनी गुर्जर पत्नी मृगनयनी के प्रेम में बनवायी थी। आज गूजरी महल को मूर्तिकला के संग्रहालय का रूप दे दिया है। यहाँ देवी शालभंजिका की प्रतिमा रखी हुई है। इसके अलावा ग्वालियर में अकबर के नवरत्नों में से एक और शास्त्रीय संगीत गायक मियां तानसेन का मकबरा यहाँ बना है। यह इमारत प्रारंभिक मुगलीय वास्तुशैली के आधार पर बनी है। मकबरा पारंपरिक मुस्लिम शैली के बगीचे से घिरा हुआ है। महान सूफी संत गौस मोहम्मद को तानसेन के मकबरे के नजदीक स्थित है। उनका मकबरा परंपरागत मुगल शैली पर आधारित है। इसकी मुख्य विशेषता षट्कोणीय स्तम्भ और नुकीले पत्थरों का प्रयोग है।
मुगलकालीन स्थापत्य कला (Architecture of Mughal Period)
मुगलकालीन स्थापत्य कला की प्रमुख विशेषता यह है कि इस काल में पहली बार आकार एवं अलंकरण की विविधता का प्रयोग निर्माण के लिए पत्थर के अलावा प्लास्टर एवं गच्चकारी का प्रयोग किया गया। मुगल स्थापत्य की दुसरी विशेषता यह है सजावट के लिए संगमरमर पर जवाहरात के जड़ाऊ काम किये गये। इसके अलावा पत्थरों को काट कर फल पत्ती, बेलबटे को सफेद संगमरमर में जड़ा जाता था। इस काल में बनाए गये गुम्बदों एवं बुर्जो को ‘कलश‘ से सजाया गया है।
मुगल वंश के संस्थापक बाबर ने वास्तुकला में विशेष रुचि दिखाई। उसकी आत्मकथा ‘बाबरनामा‘ के अनुसार तत्कालीन स्थानीय वास्तुकला में संतुलन का अभाव था इसलिए उसने निर्माण कार्यों में इस बात का विशेष ध्यान रखा कि इमारतें सामंजस्यपूर्ण और ज्यामितिय हों। बाबर के लगवाये बागों में कश्मीर का निशात बाग, लाहौर का, शालीमार बाग तथा पंजाब को तराई में पिंजोर बाग बहुत मशहूर हैं। उसने आगरा में ज्यामितीय आधार पर ‘आराम बाग‘, पानीपत के काबुली बाग में एक स्मारक मस्जिद (1524 ई.), मुरादाबाद (उ.प्र.) के निकट सम्भल में ‘जामी मस्जिद‘ (1529 ई.). आगरा में लोदी के पुराने किले के भीतर की मस्जिद आदि इमारतें बनवाई। इसमें पानीपत की मस्जिद की विशेषता यह है कि इसके निर्माण में ईंटों का प्रयोग किया गया है। उसका पुत्र एवं गद्दी का वारिस हुमायूँ विपरीत राजनीतिक परिस्थितियों के कारण वास्तुकला के क्षेत्र में कुछ खास नहीं कर संका। उसने 1533 ई. में दिल्ली में यमुना के किनारे ‘दीनपनाह‘ (धर्म का शरणस्थल) नामक नगर की नींव डाली। इस नगर को अब ‘पुराना किला‘ के नाम से जाना जाता है। इसकी दीवारें अनगढ़े पत्थरों से निर्मित हैं। इसके अतिरिक्त हुमायूँ ने फतेहाबाद में फारसी स्थापत्य शैली में दो मस्जिदें (1540 ई.) बनवाईं।
अकबर के शासन काल में हुए निर्माण कार्यों में हिन्दू-मुस्लिम शैलियों का व्यापक समन्वय दिखता है। अबुल फ़ज़ल ने अकबर के विषय में कहा है कि, ‘सम्राट सुन्दर इमारतों की योजना बनाता है और अपने मस्तिष्क एवं हृदय के विचार से पत्थर एवं गारे का रूप दे देता है।‘ अकबर ने कई किलों का निर्माण करवाया, जिसमें आगरा में लाल पत्थर से बना किला बहुत प्रसिद्ध है। सन् 1572 में अकबर ने आगरा से 36 किलोमीटर दूर फतेहपुर सीकरी में किलेनुमा महल का निर्माण शुरु किया जो आठ सालों में पूरा हुआ। पहाड़ी पर बसे इस महल में एक बड़ी कृत्रिम झील, गुजरात तथा बंगाल शैली में कई भवन बनवाये गये। इनमें गुफाएँ, झरोखे तथा छतरियाँ थीं। हवा का आनंद लेने के लिए बने ‘पंचमहल‘ की सपाट छत को सहारा देने के लिए विभिन्न स्तम्भों का प्रयोग हुआ। सुसज्जित स्तंभ का प्रयोग भारत में सदियों से मंदिर निर्माण के लिए होता आ रहा था। महल की महिलाओं के लिए बने महलों में से अधिकांश गुजराती शैली में हैं। दीवारों तथा छतों के अलंकरण के लिए चमकीले नीले पत्थरों का प्रयोग हुआ। यह ईरानी स्थापत्य का प्रभाव है। फतेहपुर सीकरी की सबसे प्रभावशाली इमारत गुजरात विजय से उपलक्ष्य में ईरानी शैली में बना बुलन्द दरवाजा है। यह प्रभाव मुगल भवनों में आम रूप से प्रयोग हुआ है। अकबर ने निर्माण कार्य पर अधिक धन अपव्यय न कर ऐसी इमारतों का निर्माण करवाया, जो अपनी सादगी से ही सुन्दर लगती थी। उसने ‘मेहराबी‘ एवं ‘शहतीरी‘ शैली का समान अनुपात में प्रयोग किया। अकबर ने अपने निर्माण कार्यों में लाल पत्थर का प्रयोग किया। अकबर की समन्वयकारी नीति को उसकी इमारतों में देखा जा सकता है।
जहाँगीर के शासनकाल के अंतिम दिनों में पूरी तरह से संगमरमर से भवनों का निर्माण आरम्भ हो गया था। इन इमारतों की दीवारों पर कीमती पत्थरों से नक्काशी है। वास्तुकला के क्षेत्र में जहाँगीर ने बहुत अधिक रुचि नहीं दिखाई। उसने बाग-बगीचों एवं चित्रकारी को अधिक महत्व दिया। इसलिए कुछ इतिहासकारों ने जहाँगीर के काल को स्थापत्य कला का विश्राम काल कहा है।
भवन बनाने का तरीका शाहजहाँ के समय में खूब इस्तेमाल हुआ। पूर्ण संगमरमर की इमारत ताजमहल, मुगलों द्वारा विकसित वास्तुकला की सभी शैलियों का समन्वय माना जाता है। अकबर द्वारा निर्मित हुमायूँ का मकबरा इसी ताज का पूर्वगामी कहा जाता है। शाहजहाँ के शासनकाल में मस्जिद निर्माण कला भी अपने शिखर का पहूँची। साथ ही सफेद संगमरमर का प्रयोग भी चरमोत्कर्ष पर पहुंचा। राजस्थान के श्मकरानाश् नामक स्थान से मिलने वाला संगमरमर वृत्ताकार कटाई के लिए अधिक उपयुक्त था। नक्काशी युक्त या पर्णिल मेहराबें, बंगाली शैली के मुड़े हुए कंगूरे, जंगले के खम्भे आदि शाहजहाँ के काल की विशेषताएँ हैं। अकबर की इमारतों की तुलना में शाहजहाँ की इमारतें चमक-दमक एवं मौलिकता में घटिया हैं, परन्तु अतिव्ययपूर्ण प्रदर्शन एवं समृद्ध और कौशलपूर्ण सजावट में वे अग्रणी हैं, जिससे शाहजहाँ काल की वास्तुकला बड़े पैमाने पर रत्नों के सजाने की कला बन जाती है।
खराब हो रही अर्थव्यवस्था से जूझ रहे एवं मितव्ययी औरंगजेब ने भवनों का निर्माण बड़े पैमाने पर नहीं किया उसने 1659 ई. में दिल्ली की मोती मजिस्द के अधूरे कार्य को पूरा किया था। 1674 ई. में उसने लाहौर में श्बादशाह मस्जिद और 1678 ई. में औरंगज़ेब ने अपनी ‘बेगम रबिया दुर्रानी‘ की स्मृति में दौलताबाद में एक मकबरे का निर्माण करवाया। ,यह ‘बीबी का मकबरा‘ के नाम से प्रसिद्ध है। जो ताजमहल की नकल है इस मकबरे के माध्यम से मुगल स्थापत्य में पतन को स्पष्ट रूप से अनुभव किया जा सकता है। भारतीय, तुर्क तथा ईरानी शैलियों के समन्वय पर विकसित मुगल वास्तुकला की परम्परा 18वीं और 19वीं शताब्दी के आरम्भ तक चलती रही। मुगल परम्परा ने कई स्थानीय राजाओं की वास्तुकला को प्रभावित किया। अमृतसर में बने स्वर्ण मंदिर में भी मुगल वास्तुकला का प्रभाव दिखता है।
मुगल काल में बनीं कुछ मुख्य इमारतों का वर्णन इस प्रकार है-
हुमायूँ का मकबरा (Humayun Tomb)
इसका निर्माण कार्य अकबर की सौतेली माँ हाजी बेगम की देख-रेख में 1564 ई. में हुआ। इस मकबरे का वास्तुकार ईरान का मीरक मिर्जा ग्यास था। इस इमारत ने आने वाले युग में स्थापत्य को नई दिशा दिखाई। यह मकबरा सफेद संगमरमर वाले गंुबद, लाल पत्थर की दीवारों और फारसी शैली में बनाया गया। यह मकबरा एक ज्यामितीय चतुर्भुजाकार बाग में बनाया गया। इस मकबरे में हिन्दू शैली की ‘पंचरथ‘ से भी प्रेरणा ली गई है। एक ऊँचे पत्थर के चबूतरे पर बने इस मकबरे का मुख्य द्वार पश्चिम दिशा में है। उभरी हुई दोहरी गुम्बद वाला यह मकबरा भारत में बना पहला उदाहरण है। उद्यानों में निर्मित मकबरों की योजना उनमें दफनाये गये व्यक्तियों के पराभौतिक स्वरूप की और संकेत है। इस प्रकार के भवनों की परम्परा में पहला भवन हुमायूँ का मकबरा है। इस परम्परा की परिणति ताजमहल में हुई। इसलिए हुमायूँ के मकबरे को ‘ताजमहल को पूर्वगामी‘ भी कहते हैं।
आगरा किला (Agra Fort)
आगरा में यमुना नदी के किनारे अकबर द्वारा बनवाया किला लाल पत्थर से निर्मिती होने के कारण ‘लाल किले‘ के नाम से विख्यात है। यह किलोमीटर लम्बा और बहुत मजबूत चहारदीवारी वाला किला है। यह मुगल शासको का शाही शहर कहा जाता है। सन् 1566 ई. में अकबर कर मुख्य वास्तुकार कॉसिम खाँ की देखरेख मे यह किला बना लगभग 5 वर्षों तक लगातार निसंख्या एवं 35 लाख रूपये खर्च के बाद यह किला बनकर तैयार हुआ। किले की मेहराबों पर पशु-पक्षी, फूल-पत्तियों को आकृतियाँ बनी हुई हैं। हालांकि इससे पहले महावों पर कुरान की आयते आकृत करने की परंपरा थी। कई भवनों वाले इस किले के पश्चिम में स्थित ‘दिल्ली दरवाजे‘ का निर्माण 1566 ई. में किया गया। किले का दूसरा दरवाजा और सिंह दरवाजा-या लाहौरी अथवा अकबरी दरवाजा के नाम से जाना जाता है। किले के स्थापत्य पर बंगाल एवं गुजरात को निर्माण शैली का भी प्रभाव देखा जा सकता है। इस किले पर ग्वालियर के किले का प्रभाव भी है। किले में बनी मुख्य इमारत इस प्रकार है-
जहाँगीरी महल – आगरे के पर ककले का एक महत्वपूर्ण इमारतें जहांगीरी सहल है। 249×260 फुट आकार वाले इस महल के चारों कोने में 4 बड़ी छतरियाँ हैं। महल के प्रवेश में बना दरवाजा नोकदार मेहराब का है। महल के मध्य में 17 फुट का आयताकार आंगन बना है। हिन्दू शैली में बने इस महल में संगमरमर का अल्प प्रयोग किया गया है। कड़ियाँ तथा तोड़े का प्रयोग इसकी विशेषता है। जहाँगीरी महल के सामने लॉन में प्याले के आकार का एक हौज निर्मित है, जिस पर फारसी भाषा में आयतें खुदी हैं। जहाँगीरो महल के दाहिनी ओर अकबरी महल का निर्माण हुआ था।
दीवान-ए-आम – इस किले में शाहजहाँ द्वारा 1627 ई. में बनवाया गया ‘दीवान-ए-आम‘ शाहजहाँ के समय का संगमरमर का प्रथम निर्माण कार्य था। इसमें सम्राट के बैठने के लिए ‘मयूर सिंहासन‘ की व्यवस्था धी। इस भवन का प्रयोग आम जनता की फरियाद सुनने के लिये होता था।
दीवान-ए-ख़ास – 1637 ई. में शाहजहाँ द्वारा निर्मित यह भवन सफेद संगमरमर की आयताकार इमारत है। ‘दीवान-ए-खास‘ में महत्त्वपूर्ण अमीर एवं उच्चाधिकारी ही आ सकते थे। इसी इमारत में शिवाजी औरंगजेब से मुलाकात करने आये थे।
मोती मस्जिद – 1564 में शाहजहाँ द्वारा निजी प्रयोग के लिए सफेद संगमरमर से बनवाई गई ‘मोती मस्जिद‘ आगरा के किले की सर्वाेत्कृष्ट इमारतों में गिना जाता है। मस्जिद में निर्मित गुम्बद मुख्य रूप से उल्लेखनीय हैं।
जामा मस्जिद – आगरा किले में स्थित इस मस्जिद का निर्माण शाहजहाँ की पुत्री ‘जहाँआरा बेगम‘ ने 1648 ई. में करवाया था। इस मस्जिद में लकड़ी एवं ईंट का भी प्रयोग किया गया है। आगरा की जामा मस्जिद को ‘मस्जिदे-जहाँनामा‘ भी कहा जाता है। किले की अन्य इमारतें इस प्रकार हैं-
ऽ स्वर्ण मंडप – बंगाली झोपड़ी के आकार की छतों वाले सुंदर मंडप।
ऽ खास महल – श्वेत संगमरमर निर्मित यह महल, संगमरमर रंगसाजी का उत्कृष्ट उदाहरण है।
ऽ मछली भवन – तालाबों और फव्वारों से सुसज्जित, परिवारिक समारोहों के लिये प्रयुक्त होता था।
ऽ मीना मस्जिद– एक छोटी मस्जिद।
ऽ मुसम्मन बुर्ज़ – ताजमहल की तरफ उन्मुख छज्जेदार एक बड़ा अष्टभुजाकार बुर्ज।
ऽ नगीना मस्जिद – दरबार की महिलाओं के लिये निर्मित मस्जिद, जिसके भीतर जनाना मीना बाज़ार था जिसमें केवल महिलायें ही समान बेचा करती थी।
ऽ नौबत खाना – इसमें राजा के संगीतज्ञ वाद्ययंत्र बजाते थे।
ऽ रंग महल – इसमें राजा का परिवार रहता था।
ऽ शाही बुर्ज – शाहजहाँ का निजी कार्य क्षेत्र।
ऽ अंगूरी बाग – ज्यामिति के आकार वाला उद्यान
ऽ शाहजहाँ महल – शाहजहाँ द्वारा लाल बलुआ पत्थर से बनवाया हुआ।
ऽ शीश महल – शाही छोटे जड़ाऊ दर्पणों से सुसज्जित राजसी वस्त्र बदलने का कमरा।
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