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कैशलेस अर्थव्यवस्था क्या है ? लाभ , की चुनौतियां , नुकसान cashless economy in hindi किसे कहते है ?

cashless economy in hindi किसे कहते है ? कैशलेस अर्थव्यवस्था क्या है ? लाभ , की चुनौतियां , नुकसान ? advantages or uses ?

‘कैशलैस अर्थव्यवस्था‘ क्या है ? इसे अपनाने से कौन-कौन से लाभ हो सकते है ?
कैशलैस अर्थव्यवस्था अर्थात् लेन-देन कैश की बजाय डिजिटल माध्यम जैसे- प्रीपेड कार्ड, UPI ,मोबाइल वॉलेट, USSD इत्यादि से हो। कैशलैस अर्थव्यवस्था के बहुत से लाभ है, जैसे-
– भ्रष्टाचार पर नियंत्रण लगेगा।
– जाली नोटों की समस्या कम होगी।
– वित्तीय समावेशन को गति मिलेगी।
– ब्लैकमनी की समानान्तर अर्थव्यवस्था, अपराध व आतंकवाद पर नियंत्रण लग सकेगा।
– पेपरमनी कम छापे जाने से सरकारी व्यय कम होगा और कम से कम पेपर का उपयोग पर्यावरण हितैषी होगा।

 वन-धन योजना
14 अप्रैल, 2018 को प्रधानमंत्री द्वारा बीजापर (छत्तीसगढ) से प्रारम्भ। इस योजना के माध्यम से परम्परागत ज्ञान और कौशल को सूचना प्रौद्योगिकी की मदद से निखारना है। इस योजना के द्वारा गैर लकड़ी के वन उत्पादन का उपयोग करके जनजातियों के लिए आजीविका के साधन उत्पन्न करने की पहल है। इससे जनजातीय समुदाय के सामूहिक सशक्तिकरण को प्रोत्साहन मिलेगा। इस योजना के अंतर्गत 30,000 स्वयं सहायता समूह की सहायता से 3,000 वन-धन केन्द्रों की स्थापना की जाएगी।
2. विशेष श्रेणी राज्य का दर्जा पाने की शर्ते कौन-कौनसी है ? वर्तमान में विशेष श्रेणी राज्यों का नाम उल्लेख कीजिए।
विशेष श्रेणी का दर्जा, केन्द्र द्वारा राज्यों के लिए किया गया एक वर्गीकरण है, जो भौगोलिक और सामाजिक-आर्थिक रूप से पिछड़े राज्यों के विकास में सहायता करता है। विशेष श्रेणी राज्य दर्जा पाने की शर्ते –
– पहाड़ी इलाके
– कम जनसंख्या घनत्व/आदिवासी आबादी का बड़ा हिस्सा।
– पड़ोसी देशों की सीमाओं के साथ सामरिक स्थान।
– आर्थिक व बुनियादी ढाँचे का पिछड़ापन।
– राज्य वित्त की गैर व्यवहार्य प्रकृति।
वर्तमान में कुल 11 राज्य-जम्मू कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, असम, अरूणाचल प्रदेश, मणिपुर, मेघालय,
मिजोरम, नागालैंड, त्रिपुरा, सिक्किम।
 
4. ‘मुख्यमंत्री विद्यादान कोष‘।
– राजस्थान के राजकीय विद्यालयों को वित्तीय सम्बल प्रदान करने तथा आधारभूत संरचना के सुदृढ़ीकरण के लिए ‘मुख्यमंत्री
विद्यादान कोष‘ की शुरूआत की गई है।
– CSR के तहत दानदाता अब शिक्षा विभाग के तहत विकसित किए जाने वाले ‘मुख्यमंत्री विद्यादान कोष‘ के तहत ऑनलाइन
सहयोग कर सकेंगे। यह शिक्षा में सहयोग के लिए लोगों को प्रेरित करेगा।
– इस ऑनलाइन प्लेटफॉर्म से भामाशाह और औद्योगिक घराने ब्ैत् के तहत जुड़कर सीधे राजस्थान सरकार को शिक्षा में किए
जा रहे नवाचारों एवं आधारभूत सुविधाओं को बढ़ाने में अपना सहयोग दे सकते है।
Part-C
नोट: निम्न प्रश्नों का उत्तर 100 शब्दों में दे। प्रत्येक प्रश्न के 10 अंक हैं।
1. संसदीय प्रणाली क्या है ? भारत में इसे अपनाने के पक्ष में निहित तर्को को समझाइए। यह अध्यक्षात्मक प्रणाली से बेहतर कैसे है ?
संसदात्मक शासन प्रणाली में व्यवस्थापिका व कार्यपालिका परस्पर संबंधित होती है और कार्यपालिका, व्यवस्थापिका के प्रति उत्तरदायी होती है। संसदात्मक शासन प्रणाली में प्रधानमंत्री व मंत्रिपरिषद् वास्तविक कार्यपालिका होती है और व्यवस्थापिका के प्रति उत्तरदायी होती है। संसदात्मक शासन प्रणाली में मंत्रिपरिषद् ‘सामूहिक उत्तरदायित्त्व के सिद्धान्त‘ के आधार पर कार्य करती है।
– भारत में भी संसदीय शासन प्रणाली को अपनाया गया है। इसके पीछे बहुत से कारण रहे है. जैसे-
1. संसदीय शासन प्रणाली भारत में ब्रिटिश शासन काल से ही अस्तित्त्व में थी। इस अनुभव के कारण यह व्यवस्था के अधिक निकट थी।
2. संसदीय शासन प्रणाली में उत्तरदायित्त्व को अधिक वरीयता दी जाती है जबकि अध्यक्षात्मक में स्थायित्व को इसलिए हमारे संविधान निर्माताओं के द्वारा उत्तरदायित्व को प्राथमिकता दी गई।
3. हमारे संविधान निर्माता चाहते थे कि कार्यपालिका व व्यवस्थापिका के मध्य टकराव नहीं हो और प्रारम्भिक लोकतंत्र में इन दो घटकों के बीच संघर्ष और टकराव के खतरे को वहन नहीं किया जा सकता। इसलिए वे चाहते थे कि एक ऐसी सरकार बने जो देश के चहुंमुखी विकास के लिए अनुकूल हो। इसलिए संसदीय व्यवस्था को अपनाया।
4. भारत में विभिन्न वर्ग जाति संस्कृति के लोग रहते है। अतः सभी वर्गो व क्षेत्रों के लोगो के हित मे बहुत अवसर सुलभ हो सके तथा राष्ट्रीय भावना को लोगों के बीच बढ़ाकर अखण्ड भारत का निमार्ण हो सकें।
इसलिए संसदीय प्रणाली को अपनाया गया है।
– संसदात्मक व्यवस्था कई मामलों में अध्यक्षात्मक प्रणाली से बेहतर है क्योंकि इसमें-
1. विधायिका व कार्यपालिका के मध्य आपसी सामंजस्य पाया जाता है। दोनों के मध्य टकराव की स्थिति नहीं पाई जाती।
2. संसदीय शासन प्रणाली में सरकार उत्तरदायी होती है जबकि अध्यक्षात्मक में सरकार उत्तरदायी नहीं होती।
3. संसदीय शासन प्रणाली में कार्यपालिका व्यवस्थापिका के प्रति उत्तरदायी होती है। अतः यह निरंकुश नही हों पाती।
4. संसदीय व्यवस्था में कार्यपालिका सभी वर्गों व क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व करती है। अतः इसको व्यापक प्रतिनिधित्व प्राप्त होता है। जबकि अध्यक्षात्मक में कार्यपालिका को व्यापक प्रतिनिधित्व प्राप्त नहीं होता।
2. निम्नलिखित पर टिप्पणी.कीजिए –
(।) निजता का अधिकार
– ‘निजता का अधिकार‘ को सप्रीम कोर्ट की संवैधानिक पीठ ने एक मौलिक अधिकार कहा है तथा इसे अनुच्छेद 31 के अंतर्गत संरक्षण प्राप्त है। ‘निजता मनुष्य के गरिमापूर्ण जीवन का अभिन्न अंग है। जीवन का अधिकार, निजता का अधिकार तथा स्वतंत्रता के अधिकार का अलग-अलग नहीं बल्कि एक समग्र रूप में देखना चाहिए।
– इसके अंतर्गत कोई व्यक्ति अपनी निजी जानकारी किसी भी समय प्राप्त कर सकता है तथा जो इन्फोर्मशन केवल अपने तक ही सीमित रखना चाहता है वह केवल उसके पास रहेगी. किसी और को जानने का कोई हक नहीं होगा।
(ठ) राज्यसभा की प्रासंगिकता
– राज्यसभा भारतीय सदन का द्वितीय सदन या उच्च सदन है, जो स्थायी है। इसके सदस्यों का चुनाव अप्रत्यक्ष होता है तथा सदस्यों का कार्यकाल 6 वर्ष होता है। प्रत्येक 2 वर्ष बाद 1/3 सदस्य कार्यमुक्त होकर, नए चुनाव होते है। इसकी वर्तमान सदस्य संख्या 245 है।
– द्वितीय सदन की व्यवस्था के पीछे संविधान सभा का मूल उद्देश्य इसके माध्यम से सभी राज्य संसद में अपना प्रतिनिधित्व सही
तरीके से कर पाएंगे।
राज्यसभा की प्रासंगिकता के कारण निम्नलिखित है-
– राज्यसभा ने कई बार अत्यन्त संवेदनशील मुद्दे जैसे पारिस्थितिकी, जनसंख्या वृद्धि, नौकरशाही की संवेदनहीनता, रेलवे जोन
आदि पर विचार करते हुए विचारों के सदन के रूप में स्थापित किया है।
– महिलाओं की समस्या, विवाह, तलाक, उत्तराधिकार, समानकार्य के लिए समान वेतन, बंधुआ मजदूरी के उन्मूलन जैसे मुद्दों को
उठाया।
– यह एक स्थायी सदन है, जो लोकसभा का विघटेन होने के बाद राज्यसभा कार्य करती रहती है।
– प्रथम सदन के जल्दबाजी में लिए गए निर्णयों पर विचार विमर्श करती है।
– लोकसभा की निरंकुशता पर रोक लगाती है।
3. ‘‘न्यायिक सक्रियता के कारण शासन के तीनों अंगों के मध्य संतुलन गड़बड़ा गया है।‘‘ इस संबंध में उचित राह क्या हो सकती है? – न्यायिक सक्रियता समाज में न्याय को प्रोत्साहन देने तथा नागरिकों के अधिकारों को सुरक्षा प्रदान करने में न्यायपालिका की सक्रिय भूमिका को दर्शाता है।
– न्यायपालिका द्वारा अपनी संवैधानिक शक्तियों के क्षेत्राधिकार से बाहर जाकर कार्यपालिका व विधायिका के कार्यक्षेत्र में जनहित की दृष्टि से हस्तक्षेप किया जाता है। परन्तु न्यायपालिका को अपनी सीमाओं के भीतर रहकर ही फैसले करने चाहिए। पिछले कुछ दशकों में न्यायपालिका अपने अधिकार क्षेत्र से परे जाकर फैसले देती है। इससे शासन के तीनों अंगों के मध्ये गतिरोध बढ़ जाता हैं सरकार के तीनों अंगो विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका अपने-अपने क्षेत्र में सम्प्रभ व सर्वोच्च है तथा हमारे देश में ‘नियंत्रण व संतुलन के सिद्धान्त‘ को अपनाया गया है। परन्तु न्यायपालिका द्वारा कार्यपालिका व व्यवस्थापिका के कार्यक्षेत्र में अनावश्यक हस्तक्षेप किया जा रहा है। तथा स्वयं विधायिका व कार्यपालिका द्वारा अपनी हद पार करने अथवा दायित्त्व न निभाने की स्थिति में न्यायिक हस्तक्षेप की अवधारणा है परन्तु न्यायिक सक्रियता से उत्पन्न दूसरे अंगों के अधिकारों के अतिक्रमण के समय इसके नियंत्रण के प्रावधान का निहायत अभाव दिखाता है।
– अत्यधिक न्यायिक सक्रियता को रोककर शासन के तीनों अंगों में समन्वय स्थापित करना चाहिए।
– न्यायालय को प्रशासनिक अधिकारियों की राह में अवरोध उत्पन्न नहीं करना चाहिए तथा इस बात को समझना चाहिए कि
प्रशासनिक अधिकारियों को प्रशासन के क्षेत्र में दक्षता हासिल होती है, न्यायपालिका को नहीं।
– अगर विधायिका व कार्यपालिका समुचित तरीके से अपना कार्य नहीं कर रही तो लोगों को चाहिए की अगले चुनाव में अपने मत का समुचित प्रयोग कर इनकी खराबियों को दूर करें।
– न्यायपालिका को आत्ममंथन की जरूरत है और उसे अनावश्यक कार्यपालिका के क्षेत्र में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए।
– न्यायपालिका का कानून को व्याख्या का अधिकार है. परन्तु उसके पास कानून बनाने व उसमें बदलाव करने का अधिकार नहीं
है।
4. ‘‘चुनाव सुधार हेतु एक साथ चुनाव प्रभावी कदम हो सकता है।‘‘ इस कथन के गुण-अवगुणों की चर्चा कीजिए।
– भारत के विधि आयोग द्वारा लोकसभा व विधानसभा के चुनाव एक साथ करवाने की सिफारिश की गई है। एक साथ चुनाव करवाने के बहुत से फायदे है जैसे-
– यह एक विकासोन्मुखी विचार है। चुनावों की बारम्बारता के कारण बार-बार आचार संहिता लगानी पड़ती है, जिससे सरकार आवश्यक नीतिगत निर्णय नहीं ले पाती व देश का विकास अवरूद्ध होता है।
– एक साथ चुनाव करवाने से चुनावों पर होने वाले भारी खर्चों में कमी आएगी व राष्ट्रीय कोष में वृद्धि होगी।
– एक साथ चुनाव होने से कालेधन पर रोक लगेगी व भ्रष्टाचार पर लगाम कसने में मदद मिलेगी।
– इससे कर्मचारियों के मूल कृत्यों के निर्वहन में तीव्रता आएगी साथ ही लोगों के सार्वजनिक जीवन के व्यवधान में कमी आएगी।
अवगुण
– यह देश के संघीय ढाँचे के विरूद्ध होगा। संसदीय लोकतंत्र के लिए घातक सिद्ध होगा।
– इससे लोकतांत्रिक मूल्यों का क्षरण होगा। अगर एक साथ चुनाव करवाये तो या तो क्षेत्रीय मुद्दे गौण हो जाएंगे या राष्ट्रीय मुद्दे। – इससे चुनाव अवधि के दौरान वास्तविक लोकतंत्र निलंबित हो जाएगा, राजनीतिक शून्यता की स्थिति उत्पन्न हो जाएगी।
– ऐसा करने के लिए संविधान की कई धाराओं में संशोधन करना पड़ेगा।
यह बात दावे से नहीं कही जा सकती की चुनावों की बारम्बारता एक साथ चुनाव करवाने में खत्म हो जाएगी। चुनावों के चक्रव्यूह से देश को बाहर निकालने के लिए कालेधन पर रोक लगाना राजनीति के अपराधीकरण के खिलाफ सख्त कानून बनाना, जनता को शिक्षण द्वारा राजनीतिक चेतना व जागरूकता को सही विकास करना जरूरी है।

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