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कश्मीरी भाषा का आधुनिक साहित्य क्या हैं ? मलयालम भाषा का आधुनिक साहित्य का इतिहास बताइए ?
मलयालम भाषा का आधुनिक साहित्य का इतिहास बताइए ? कश्मीरी भाषा का आधुनिक साहित्य क्या हैं ?
कश्मीरी भाषा का आधुनिक साहित्य
आधुनिक कश्मीरी चाहित्य का विकास भारत के अन्य साहित्यों की अपेक्षा अभी हाल में शुरू हुआ है। लेकिन अन्य भाषाओं के इतिहास में जिस गति से विकास हुआ उसकी तुलना में कश्मीरी भाषा की साहित्यकीय गति कही अधिक तीव्र रही है। संस्कृत और फारसी की समृद्धि इसे विरासत में मिली है और इसी-लिए कश्मीरी भाषा का विकास सरला हो गया। काफी लंबे अरसे तक संस्कृत और फारसी, हिदुओं और मुसलमानों में विद्वानों की भाषाएं बनी रहीं।
मकबूल करालाबारी और बहाबपारे जैसे कवियों नरे कविता में यथार्थवाद को स्थान दिया। रसूल मीर की गजलों में मानवमन की भावनाए व्यक्त होती थीं जो श्रोताओं के मन को छू जाती थीं। रसल मीर जैसे प्रणेता कवियों कावयों ने ककई अन्य कवियों को नई दिशाओं में अग्रसर होने के लिए प्रेरित किया। इन कवियों में एक थे माहजूर (1885-1952) जिन्होंने कमश्मारी में आधुनिक कविता का सूत्रपात किया। राष्ट्रवाद देशभक्ति और सामाजिक जागति की भावनाएं कविता के माध्यम से व्यक्त हान लगी। इन्हीं क्षेत्रों में माहजर ने उल्लेखनीय कार्य शुरू किया। उन्होंने परंपरागत शैली के स्थान पर नई शैली अपनाई। उससे अब्दुल अहद आजाद की लेखनी से दृढ स्वर उपजे। कश्मीरियों के विचारों को मध्य युग में निकाल कर आधुनिक युग में लाने के काम में आजाद की कविता का प्रतीकात्मक मल्लय है। इन्हीं प्रवृत्तियणे के साथ आरिफ ने कश्मीरी लोगों की क्रांतिकारी भावनाओं को जोड दिया। इसका एक उदाहरण उनकी कृति ‘मगर कारवा सो‘ है। असी ने दलित वर्ग के लोगों के दुख-दर्दो को सामने लाकर अपनी कविता केक द्वारा इस आंदोलन को और आगे बढ़ाया। इस प्रकार 20वीं शताब्दी में मध्य तक कश्मीरी कविता ने कश्मीर की परिस्थितियों का निष्पक्ष प्रतिनिधित्व किया। कई नए कवि जैसे नदीम, रोशन, राही और प्रमों, प्रगतिवाद केक प्रतिनिधि थे। कवि ने इंसान और कुदरत के बीच अटूट सबध पाया। इस विचारधारा केक प्रतिनिधि थे रोशन और प्रेमी।
आधुनिक कश्मीरी गद्य, आधुनिक कश्मीरी पद्य के साथ कदम से कदम मिला कर नही चल सका। 19वीं शताब्दी में पाश्चात्य साहित्य और अंग्रेजी भाषा ने भारत के अन्य भागों पर जो आधुनिक प्रभाव डाले थे वह कश्मीर तक नहीं पहुंचे। फारसी और उर्दू प्रभाव के कारण कश्मीरी गद्य को मुख्य रूप से प्रगति करने के लिए समुचित वातावरण नहीं मिला। पिछले कुछ ही दशकों में कश्मीरी में कहानियां, निबंध और नाटक लिखे जाने लगे हैं। गद्य लेखकों में सोमनाथ जुत्शा, उमेश कौल, रोशन, नवीन और हरवोन के नाम उल्लेखनीय हैं। अख्तर मुइउद्दीन ने गद्य शैली में कुछ सुधार किया। उनकी ‘सात संगर‘ (सात शिलाएं) एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है। अन्य उदीयमान गद्य लेखकों में हैं अली मुहम्मद लोन और कामिल। नाटक लेखन के क्षेत्र में भी प्रगति धीमी रही। कश्मीरी भाषा में आधुनिक नाटक लिखने का समारंभ जगन्नाथ बली और मुइउद्दीन हाजिनी के किया और उनकेक पीछे-पीछे आए पुष्कर भान, अली मुहम्मद लोने, जुत्शी लोशन और कामिल। नाटक के लिए कश्मीर के सामाजिक जीवन में से विषय चुने गए और ये नाटक रंगमंच पर खेले जाने के दृष्टिकोण से लिखे गए थे। उपन्यास और काल्पनिक कथाओं को लिखने में कश्मीरी लेखकों को अभी तक कोई सफलता प्राप्त नहीं हुई हैं। प्रेस, रेडिया, समाचारपत्र और उच्च शिक्षा के प्रसार से आगे आने वालों वर्षों में कश्मीरी गद्य के विकास को प्रोत्साहन मिलेगा।
मलयालम भाषा का आधुनिक साहित्य
केरल भी भाषा मलयालम 15वीं शताब्दी से ही बड़ी साहित्यिक तेजिस्वता लिए हुए थी। मलयालम साहित्य का आधुनिक दौर 19वीं शताब्दी में शुरू हुआ।
क्रिश्चियन मिशनरियों ने अपने धार्मिक लेखों और अनुवादों के माध्यम से मलयालम में आधुनिक गद्य शैली लाने की दिशा में महत्वपूर्ण योगदान किया है। इस तरह की गद्य शैली के अगुआ चंदू मेनन थे। उनका उपन्यास ‘इंदुलेखा‘ इस दृष्टि से एक महान उपलब्धि था कि यह ऐसी मरल भाषा में लिखा हुआ था जिसे आम आदमी भी समझ सके। यह उपन्साय साहित्यिक शैली के क्षेत्र में एक साहसपूर्ण और स्पष्ट रूप से नया प्रयोग सिद्ध हुआ। इसने अन्य लोगों को अनुसरण के लिए प्रेरणा दी। ए. आर. राजराजा वर्मा ने व्याकरणचार्य के रूप में कार्य करके आधुनिक शैले की नींव को सुदृढ़ किया। 20वीं शताब्दी के पहली दशक तक यह गद्य शैली पूरी तरह स्थापित हो चुकी थी।
नए गद्य की श्रेष्ठ कृतियों के नमूने थकाजी शिवशंकर पिल्ले की कलम से निकले। उनके प्रसिद्ध उपन्यास ‘रनटी टंगाजी‘ यानी ‘दो मटठी अनाज‘ में भूमिहीनों के जीवन का बड़ा सजीव चित्र प्रस्तुत किया गया है और उनके उपन्यास ‘चेम्मीन‘ या ‘श्रं मछलियां‘ में मछुओं के जीवन का विवरण है। आधुनिक शैली के अन्य प्रसिद्ध उपन्यासों में हैं बशीर का ‘बाल्यकाल सखी‘ यानी ‘बचपन का दोस्त‘, पी. केशवदेव का ‘ओडायीन निन्नू‘ अर्थात् ‘गटर से‘ और एस. के. पोतेकर का ‘विषकन्याका‘। कई ऐतिहासिक उपन्यास भी लिखे गए। इनमें सी. वी. रमण पिल्ले का ‘राम राजा बहादुर‘. के. एम. पणिकर का ‘केरल सिंहमम‘ अपना तप्पूरण का ‘भुटारयार‘ उपन्यास बहुत महत्वपूर्ण हैं।
यह 19वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध के दौरान अपना मध्ययुगीन रूप त्याग कर आधुनिक रूप में आई। केरल वर्मा दस विकास की प्रक्रिया के प्रणेता थे। ‘मयूर संदेशम्‘ उनकी मूल्यवान कृति है। कालांतर में नए-नए विचारों वाले कवि आगे कवि आगे आए जिन्होंने जनभाषा का प्रयोग किया। वेनमानी नम्बूदिरीपाद ने अपनी कविता उस तरह लिख जिस प्रकार कि वे लोगों को बातचीत करते हुए सुनते थे। उन्होंने पुरानी प्राचीन शैलियां और पुराने जमाने की व्याकरण संबंधी कठोरता का परित्याग किया। 20वीं शताब्दी के प्रारंभिक दशकों में आधुनिक कविता ने और सशक्त रूप धारण किया। कमारन असन की प्रसिद्ध कविता ‘नलिनी‘ ने नई दिशा दिखाई। 1915 ई. में वल्लथोल की ‘ओरू चित्रम‘ यानी ‘एक चित्र‘ नामक कविता प्रकाशित हुई जो नई शैली में लिखी गई एक उत्कृष्ट कृति थी। इसके बाद उन्होंने जो कुछ लिखा वह लोगों की सामाजिक आर्थिक-परिस्थिति और उस समय व्याप्त नई भावना के बारे में था। उनकी ‘मगदालाना मरियम‘ इस तरह की भावना की एक अनोखी मिसाल है। इसन ने भी बड़ी सफलता के साथ सामाजिक बुराइयों को अपनी कविताओं में प्रदर्शित किया। उनकी कविताएं ‘दुरावस्था‘, ‘चांडाल भिक्षुकी‘ और ‘करूणा‘ नई कवितता के कुछ ज्वलंत उदाहारण थे। जिन अन्य लोगों ने मलयालम कविता को समृद्ध बनाया वे थे वी. सी. बालकृष्ण पानकर, नलप्पत नारायण मेनन, चंगमुपुझााकृष्ण पिल्ले, के. एम. पनिकर और जी. शंकर करूप। 20वीं शताब्दी के तीसरे और चैथे दशकों में प्रगतिवादी कवियों के एक दल का उदय हुआ जिसका उद्देश्य कविता के रूप् और विषय-वस्तु में आमूली परिवर्तन लाना था। इस प्रगतिवादी आंदोलन या ‘पुरोगमन वदन‘ के कवि थे एन. वी. कृष्णवारियर, अक्किताम, ओलपमन्न, वयलार राम वर्मा, केदमंगलम पप्पूकुट्टी, पी. भसकरन, इदासेरी गोबिन्दन नायर, अनुजन और ओ. एन.वी. कृष्णवारियार अक्किताम, ओलपमनना, वयलार राम वर्मा, केदमंगलम पप्पकटटी पी. भासकरन, इदासेरी गोबिन्दन नायर, अनुजन और ओ, एन.वी. कुरूप। उनकी कविताओं में उन दुर्दशापूर्ण परिस्थितियों का विवरण था जिसमें लोग रहते और मेहनत करते थे, वयलोपल्ली श्रीधर मेनन, वेनीकुलम, गोपाल करूप और पलाईनारायणन नायर, कुछ ऐसे आधुनिक कवि है, जिनकी कविताओं में प्रगतिशील विचारों और कवित्वमय मूल्यों का समावेश है।
मलयालम नाटक को भी समृद्धि विरासत में मिली है। इस प्रदेश के परंपरागत साहित्यिक नाटक का नाम दृश्यकाव्य आधनिक नाटक काके समद्ध बनाने वाले प्रमख लेखकों में सी. वी. रमण पिल्ले का उपलाब्ध महान है। उनके नाटक ‘कुरूपिल्ला कलारी‘ यानी ‘बिना अध्यापक का स्कल‘ में समाज की परिस्थितियों का बड़ा जीवंत वर्णन है। ई. वी. कृष्ण पिल्ले ने काफी मपत्वपूर्ण ऐतिहासिक नाटक लिखे। के. पद्मनाभ पिल्ले ने अपने प्रसिद्ध नाटक ‘कलवारीयीले पादपम‘ में ईसा मसीह के जीवन के एक पहलू को दर्शाया है। मलयालम नाटक को समृद्ध बनाने में अन्य लेखको। अलावा एन. कृष्ण पिल्ले, इदासेयर गोबिन्दन नायर ने महत्वपूर्ण योगदान किया है।
मलयालम में लेखकों को लघु कहानियां लिखने में भी उल्लेखनीय सफलता प्राप्त हुई है। तकाजी प्रमुख कहानीकारों में से हैं, जिन्होंने ऐसे सजीव कथानक लिखे कि लोग बरबस ही उन्हें पढ़ते थे। पोनकुन्नम बारके, बशीर, के. टी. मुहम्मद करूर, पी. सी. कुट्टीकृष्णन, पुत्तेक्काट, सरस्वती अम्मां, ललिताम्किा अंतराजनम इस क्षेत्र के कुछ और प्रसिद्ध कहानीकार थे। उन्होंने अपनी कहानियों को आधुनिकक समय की पेचीदगियों का प्रतिबिंब बनाया।
मलयालम साहित्य गंभीर विषयों के गद्य लेखन में बड़ा संपन्न है। बहुत पहले यानी 19वीं शताब्दी के अंतिम दशक में पी. गोबिन्द पिल्ले ने ‘मलयाला भाष्य चरित्रम्‘ या ‘मलयालम साहित्य का इतिहसा‘ लिखा था। स्वाधीनता के बाद एक और महान साहित्यिक इतिहास की कृति छपी है जिसे आर. नारायण पनिक्कर ने सात खंडों में प्रकाशित किया। इसका नाम है ‘केरल भाषा साहित्य चरित्रम‘।
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