स्वामी महावीर ने कितने वर्ष घोर तप किया था , महावीर स्वामी के उपदेश की भाषा शिक्षा कौन कौनसी है

By   August 15, 2021

महावीर स्वामी के उपदेश की भाषा शिक्षा कौन कौनसी है स्वामी महावीर ने कितने वर्ष घोर तप किया था ?

प्रश्न: महावीर स्वामी के जीवन का परिचय देते हुए जैन धर्म के प्रमुख सिद्धातों की विवेचना कीजिए।
उत्तर: जैन ग्रंथों के अनुसार महावीर स्वामी ब्राह्मण ऋषभदत्त की पत्नी देवानंदा के गर्भ में पहुंच गये थे। जब देवताओं को यह मालूम पड़ा कि इससे पहले सभी तीर्थंकर क्षत्रिय कुल में पैदा हुये तो महावीर को ब्राह्मणी देवानंदा की कोख से निकालकर ज्ञातृक क्षत्रिय सिद्धार्थ की पत्नी त्रिशला की कोख में स्थापित किया। महावीर का जन्म 599 ई. पू. में कंडग्राम के ज्ञातक क्षत्रिय सिद्धार्थ के घर में हुआ। इनकी माता का नाम त्रिशला था जो लिच्छवी शासक चेटक की बहन थी। इनकी पत्नी यशोदा एवं पुत्री प्रियदर्शना थी। जामाली इनका दामाद एवं भांजा था। इन्होंने 30 वर्ष की आयु में बड़े भाई नंदीवर्धन की अनुमति से गृह त्याग किया। कैवल्य (ज्ञान) की प्राप्ति 12 वर्ष बाद 42 वर्ष की आयु में जुम्भीका ग्राम के निकट ऋजुपालिका नदी के तट पर साल वृक्ष के नीचे हुई। कैवल्य प्राप्त होने के कारण ये ‘कैवलिन‘ कहलाये। इन्द्रियों को जीतने के कारण ‘जिन‘ कहलाये। संसार सागर से पार होने के लिए घाट का निर्माण करने वाला होने के कारण तीर्थकर कहलाये। सभी बंधनों से मुक्त होने के कारण निर्गन्थ हुए। योग साधना के कारण अर्हत् कहलाये और साधना के समय अटल रहने एवं अद्भुत पराक्रम दिखाने के कारण महावीर कहलाये। महावीर के कुछ अन्य नाम भी मिलते हैं – वीर, अतिवीर, सन्मति और निगंठना पुत्र आदि। महावीर ने प्राकृत भाषा में प्रवचन दिये। मथुरा व काशी को प्रमुख केन्द्र बनाया। इन्हें 72 वर्ष की अवस्था में पावापुरी (बिहार) में निर्वाण प्राप्त हुआ।
जैनधर्म के सिद्धान्त: इसकी सांख्य दर्शन के साथ सजातीयता है, ये हैं –
(1) निवृत्ति मार्ग: सांसारिकता का त्याग।
(2) अनिश्वरवादिता: ईश्वरीय सत्ता में अविश्वास्। जैन धर्म में ईश्वर की मान्यता नहीं है। संसार है तथा वास्तविक है, किन्तु इसकी सृष्टि का कारण ईश्वर नहीं है अर्थात् सृष्टि का कोई सृष्टा नहीं है।
(3) कर्म एवं पुनर्जन्म में विश्वास: जैसा कर्म करेगा वैसा फल (पुनर्जन्म) मिलेगा।
(4) आत्मा की अमरता: आत्मा न पैदा होती है और न मरती है सिर्फ अपना रूप बदलती है।
(5) सृष्टि की रचना जीव और अजीव से: यहां जीव में आत्मा चेतना युक्त है और अजीव में जहां आत्मा चेतना रहित होती है-से मिलकर सृष्टि की रचना हुई है।
(6) विरल का सिद्धान्त: यह कर्मफल से मुक्ति हेतुएकमात्र उपाय है अर्थात् निर्वाण प्राप्ति का साधन। इसमें सम्यक्, दर्शन, सम्यक् ज्ञान और सम्यक् चरित्र (आचरण) को सम्मिलित किया गया है।
सम्यक दर्शन: यथार्थ ज्ञान के प्रतिशृद्धा एवं तीर्थंकरों के प्रति सम्मान।
सम्यक् ज्ञान: वस्तु के सही स्वरूप को जानना।
सम्यक चरित्र रू मन, वचन तथा कर्म का संयम रखना।
(7) अनेकात्मवाद रू प्रत्येक जीव की विभिन्नता का कारण उनकी आत्माओं में भिन्नता का होना है।
(8) कैवल्य रू पूर्ण एवं निरपेक्षज्ञान ही कैवल्य है।
(9) पंच महाव्रत रू जिनमें सत्य, अहिंसा, अस्तेय, अपरिग्रह और ब्रह्मचर्य सम्मिलित किये गये हैं।
(10) अनेकान्तवादध् स्यादवाद रू यह वस्तु के स्वरूप से संबंधित है।
(11) सप्तभंगीय सिद्धान्त रू किसी भी वस्तु के बारे में 7 प्रकार से कथन करने की पद्धति ही सप्तभंगीय कही जाती है।
(12) आस्त्रव रू कर्मों का जीव की ओर प्रवाह होना। इसके कारण जीव अजीव के साथ मिल जाता है और उनका बंधन हो जाता है।
(13) संवरा रू अजीव का प्रवेश अवरूद्ध हो जाना।
(14) निर्जरा रू जीव में जो अजीव का प्रवेश हो चुका, उसे निकालना निर्जरा है।
(15) मोक्ष रू इन दोनों क्रियाओं (संवरा व निर्जरा) का फल मोक्ष है। अर्थात जीव का अजीव से मुक्त होना ही मोक्ष है। जो त्रिरत्न के द्वारा ही सम्भव है। इसे निर्वाण भी कहा गया है। जिसे जैन धर्म का अंतिम लक्ष्य बताया गया है। जैन धर्म के अनुसार कठिन तप के द्वारा ही मोक्ष की प्राप्ति की जा सकती है। इसके लिए मठवासीय जीवनयापन आवश्यक है।
(16) मन और काया शुद्धि पर विशेष बल रू महावीर स्वामी के क्रियमाणकृत सिद्धान्त को लेकर उनके दामाद जमालि के साथ मतभेद हो
गया। यह जैन धर्म में मतभेद का प्रथम उल्लेख है। महावीर स्वामी कार्य के विचार को भी महत्व देते थे जबकि जमालि केवल क्रियान्वति को ही महत्व देते थे। इसलिए जमालि ने बहुत्तरवाद चलाया।

प्रश्न: भारतीय धर्म एवं दर्शन के विकास पर हड़प्पीयजनों की धार्मिक प्रवृत्तियों के योगदान की समीक्षा कीजिए।
उत्तर: भारतीय धर्म एवं दर्शन को सैन्धव सभ्यता का महत्वपूर्ण योगदान रहा है जो आज भी देखने को मिलता है। सिंधु सभ्यता के अनेक देवी-देवताओं का अंकन या मूर्तियां आज भी बहुदेववाद में दिखाई देती हैं। सिंधु समाज में मातृदेवी का प्रमुख स्थान था। जिसका अत्यन्त विकसित रूप शाक्त धर्म के रूप में पाते हैं। पशुपति शिव जैसे देवता की धारणा सिंधु सभ्यता की देन है। वृक्ष पूजा, लिंग पूजा, जल एवं सूर्य पूजा, स्वास्तिक प्रयोग आदि हमें अभी भी दिखाई देता है। सिंधु सभ्यता की कुछ मुद्राओं पर ध्वज बना हुआ है। जो परवर्ती काल में हिन्दू देवी-देवताओं के लिए भी बहुत लोकप्रिय रहा है। मातृदेवी व अन्य कुछ देवताओं को नग्न दिखाना एवं कुछ कायोत्सर्ग मुद्रा वाली मूर्तियां जैन तीर्थकरों की मूर्तियों से मिलती हैं।
धार्मिक अनुष्ठानों में नरबलि और पशुबलि के जो संकेत मिलते हैं उनसे ज्ञात होता है कि वह परम्परा ऐतिहासिक काल में जारी थी। जल का धार्मिक महत्व, सामहिक स्नान सामूहिक स्नान के लिए वृहत स्नानागार का प्रबंध आदि का प्रचलन भी यथावत रहा। पशुओं का धार्मिक महत्त्व था। बाद में स्वतंत्र रूप से या देवताओं के वाहन के रूप में आदरपूर्ण स्थान दिया गया। योगी की मर्ति में बाँया कंधा ढ़के दाँये कंधे के नीचे से होकर धारण किये दिखाई गई हैं. बाद में ऐसा अंकन बुद्ध की मूर्तियों में पाते हैं। पशुपति शिव की मूर्ति में आभूषण दिखाये गये हैं ये बाद में देवी देवताओं एवं यक्षों की मूतिर्यो में भी लोकप्रिय रहे हैं। मोहनजोदड़ो की नृतकी की मूर्ति को मंदिर से सम्बद्ध माना जाता है। उसे आज की देवदासी प्रथा का पूर्वरूप माना जाता है।
दर्शन: सिंधु सभ्यता में योग का प्रचलन था, जो बाद में अनेक सम्प्रदायों में महत्वपूर्ण स्थान पा सका। गण्डे, ताबीज का प्रयोग, भूत-प्रेत, जादूटाना आदि में विश्वास, परवर्ती भारतीय जीवन में पर्याप्त रूप से प्रचलित हैं। कालीबंगा और लाथल से प्राप्त अग्निवेदियाँ बाद की संस्कृति में भी मिलती हैं। देवों में अग्नि को महत्वपूर्ण स्थान मिला हुआ हैं। सैन्धव लाग आत्मा के आवागमन में विश्वास करते थे। मृतकों के साथ उनकी पंसद की वस्तएं रखते थे, जो आज भी प्रचलित है। मोहनजोदड़ो का वृहत स्नानागार धार्मिक अनुष्ठान के लिए सामूहिक स्नान के लिए प्रयुक्त होता था। ऐसा विश्वास आर मान्यता आज भी है। दाह संस्कार का प्रचलन जो उस समय किया गया था उसे ही हम आज पाते हैं। हड़प्पीय मुद्राओं के अंकनों में पौराणिक आख्यानों का अंकन विभिन्न रूपों में अनवरत रहा है। मार्शल के शब्दों में ‘‘हिंदू धर्म के अनेक प्रमख तत्वों का आदि रूप हमें सिंधु सभ्यता में ही मिल जाता हैं।‘‘
प्रश्न: हड़प्पन लोगों के सामाजिक, आर्थिक एवं धार्मिक जीवन की पुनर्रचना में मुद्राओं एवं मुद्रांकन के महत्त्व का मूल्यांकन कीजिए।
उत्तर: हड़प्पा सभ्यता की जानकारी प्राप्त करने हेतु, हमें पुरातात्विक खुदाइयों पर ही निर्भर रहना पड़ता है। हड़प्पा से पुरातात्विक साक्ष्य के रूप में प्रस्तर मूर्तियाँ, धातु मूर्तियाँ, मृण्मूर्तियाँ, मनके, मृद्भाण्ड तथा मोहरें (मुद्राएँ) आदि प्राप्त हुई है। हड़प्पा सभ्यता से प्राप्त मुद्राओं तथा उन पर किए गए अंकनों से हम वहाँ की सामाजिक, आर्थिक एवं धार्मिक जीवन की पुनर्रचना कर सकते हैं। सैन्धव मुद्राएँ सेलखड़ी की बनी होती थी। कुछ काँचली मिट्टी, गोमेद तथा चर्ट एवं मिट्टी की बनी मद्राएँ भी प्राप्त हुई हैं तथा उन पर विभिन्न आकतियाँ भी निर्मित हैं। मोहनजोदडो, कालीबंगा तथा लोथल से प्राप्त मद्रांकों पर एक ओर सैन्धव लिपि से युक्त महर की छाप है तथा दूसरी ओर भेजे जाने वाले माल का निशान अंकित है। मुद्राओं पर एक श्रृंगी पशु, कूबड़ वाला बैल, हाथी, भैंसा आदि अंकित हैं। मोहनजोदड़ो से प्राप्त एक मुद्रा पर ‘पशुपति शिव‘ का अंकन है। इसी मुद्रा पर बाघ, गैण्डा, भैंसा, हिरण आदि का भी अंकन है। लोथल एवं मोहनजोदड़ो से प्राप्त मुद्राओं पर नाव की आकृति अंकित है। हड़प्पा, मोहनजोदड़ो से प्राप्त मुद्रा पर अन्नागार, स्वास्तिक के चिह्न, नारी आकृतियाँ (मातृदेवी) आदि अंकित हैं। मेसोपोटामिया से हड़प्पाई मोहर मिली है तथा लोथल से फारस की मुद्राएँ मिली हैं। धार्मिक जीवन के विषय में मातृपूजा, लिंगपूजा, पशु-पूजा, पशुपति पूजा, नागपूजा, वृक्षपूजा आदि के विषय में जानकारी प्राप्त कर सकते हैं। आर्थिक क्षेत्र में उनकी उन्नति का ज्ञान प्राप्त कर सकते हैं। आन्तरिक एवं विदेश व्यापार का अनुमान लगाने में सफल हुए हैं। यदि हमारे पास मुद्रारूपी ये पुरातात्विक साक्ष्य न होते, तो इतनी विस्तृत सभ्यता के विषय में हमारी जानकारी अधरी रहती तथा हम हड़प्पा सभ्यता के अनेक पहलुओं के विषय में नहीं जान पाते। हालांकि मुद्राओं की । प्राप्ति सीमित संख्या में ही हुई है परन्तु इससे जो जानकारी मिलती है, वह अमूल्य है। इस सभ्यता के विषय में और अधिक तथा यथेष्ठ जानकारी अधरी रहती तथा हम हड़प्पा सभ्यता के अनेक पहलुओं के विषय में नहीं जान पाते। इस सभ्यता के विषय में और अधिक तथा यथेष्ठ जानकारी हेतु हमें भविष्य की खुदाइयों पर ही निर्भर रहना होगा तथा लिपियों को पढ़ने में सफलता प्राप्त करनी होगी।
प्रश्न: वैदिक देवताओं की अवधारणा का मूल्यांकन कीजिए।
उत्तर: वैदिक धर्म का स्वरूप प्रारम्भ में भौतिकवादी था। उन्होंने प्रकृति की रहस्यमय शक्तियों का मानवीकरण कर दिया था। हालांकि दर्शन की शुरूआत ऋग्वैदिक काल के अन्तिम समय से हो गयी थी, लेकिन आध्यात्मिक चिंतनधारा का पर्ण विकास उपनिषदों और आरण्यकों में ही दिखता है।
वैदिक धार्मिक जीवन में कबीलाई प्रभाव दिखाई देता है। ऋग्वेद में ऋत् की अवधारणा देखी जाती है जिसे ‘सष्टि की नियमितता‘ ‘भौतिक एवं नैतिक व्यवस्था‘, ‘अंतरिक्ष एवं नैतिक व्यवस्था‘ के रूप में माना गया है। ‘ऋतु‘ को नैतिक व्यवस्था व देवताओं का नियामक माना गया है। इसी के द्वारा लोगों को भौतिक समृद्धि एवं जीवन-यापन के अन्य साधन प्राप्त होते हैं।
ऋग्वैदिक आर्य प्रकति पजक एवं बहुदेववादी थे। ‘देववाद‘ की परिकल्पना का एक निश्चित आधार नहीं था। कभी विविध देवताओं की सत्ता का आभास मिलता है अर्थात् बहुदेववाद (पॉलीथीइज्म) तो कभी हीनोथीज्म अर्थात जिस समय जिस देवता की प्रार्थना की गयी उसे ही सर्वोच्चय मान लिया। तो कभी ‘प्रजापति‘ को परम पुरुष के रूप में स्वीकार करके एकेश्वरवाद (मोनोथीइज्म) दिखाई देता है और जब सर्वश्रेष्ठ रूप में स्वीकार किया गया तो सर्वेश्वरवाद (पैन्थीइज्म) दिखता है।
हालांकि ऋग्वेद में देवताओं की संख्या 3339 बताई गई है, लेकिन वे जिन देवताओं में विश्वास करते थे उनकी सख्ंया 33 थी। ‘यास्क‘ ने इन 33 देवताओं को तीन वर्गों में विभक्त किया था, जो इस प्रकार हैं
1. आकाशीय देवताओं में – द्यौ, वरुण, मित्र, सूर्य, पूषन, सविता, विष्णु, आदित्य, ऊषा आदि।
2. अन्तरिक्षवासी देवताओं में — इन्द्र, मित्र, रुद्र, मरुत, वायु, पर्जन्य, आपः प्रमुख है।
3. पृथिवीवासी देवताओं में – पृथ्वी, अग्नि, बृहस्पति, सोम आदि प्रधान हैं।
इन देवताओं में सर्वोच्च स्थान इन्द्र का था जिनकी स्तुति 250 मन्त्रों में मिलती है तथा उन्हें वर्षा एवं प्रकाश का देवता माना गया है। इसके अलावा वह दुर्गों के रक्षक भी थे। दूसरा स्थान अग्नि का था जिसकी पूजा का वर्णन 200 सूक्तों में वर्णित है। सोम का तीसरा स्थान तथा 144 मंत्रों (नौवें मण्डल) में इसकी स्तुति की गई है। वरुण से संबंधित 7वाँ मण्डल है, जिसे शक्ति, नैतिकता एवं न्याय का देवता माना गया था। सोम वनस्पति का देवता था और सूर्य प्रकाश का तूफान का देवता था और पूषन् पशुओं का। देवियों में प्रमुख अदिति एवं ऊषा थी। देवताओं की अपेक्षा देवियों की संख्या और उनका महत्त्व कम था।
देवताओं के अतिरिक्त प्रकृति की विभिन्न शक्तियों एवं लोकों का प्रतिनिधित्व करने वाले जैसे भूत-प्रेत, राक्षस, अप्सरा, पिशाच आदि का भी उल्लेख मिलता है। देवताओं की पूजा पारलौकिक शक्तियों को प्रसन्न करने, उनके प्रकोप से बचने, पुत्र, धन-धान्य और ‘विजय‘ आदि की कामना से की जाती थी। उन्हें प्रसन्न करने हेतु स्तुति, यज्ञाहुति आदि किए जाने पर बाद में इन देवताओं का एकीकरण भी किया गया जैसे – इन्द्र-मित्र, वरुण-अग्नि जैसे युगल देवता भी बने। पारलौकि शक्तियों से बचने हेतु जादू-मन्तर, टोने-टोटके आदि का भी प्रयोग किया जाता था।