सीपिया का पाचन तंत्र , श्वसन तंत्र , परिसंचरण तन्त्र क्या है , sepia digestive system , Cuttlefish Respiratory system in hindi

पढेंगे सीपिया का पाचन तंत्र , श्वसन तंत्र , परिसंचरण तन्त्र क्या है , sepia digestive system , Cuttlefish Respiratory system in hindi ?

पाचन तन्त्र (Digestive system) : सीपिया की आहार नाल सुविकसित होती है। आगे की ओर आहारनाल मुख द्वारा बाहर खुलती है तथा पीछे की ओर गुदाद्वार द्वारा बाहर खुलती है।

मुख (Mouth) : मुख मुखीय भुजाओं के मध्य में स्थित होता है। मुख चारों तरफ से एक वृत्ताकार मांसल होंठ (lip) से घिरा रहता है जिस पर अनेक अंकुरक (papellae) पाये जाते हैं। होंठ के भीतर की ओर तोते की उल्टी चोंच के समान दिखाई देने वाले तीक्ष्ण शक्तिशाली, शृंगीय जबड़े पाये जाते हैं।

ग्रसनी (Pharynx): मुख, एक मोटी भित्ति वाली पेशीय ग्रसनी या मुखगुहा (pharynx or buccal cavity) में खुलता है। मुखगुहा में एक जिव्हा (tongue) या ओडोन्टोफोर (odontophore) तथा रेडुला या रेतनांग (redula) पाया जाता है।

ग्रसिका (Oesophagus): ग्रसनी पीछे की ओर ग्रसिका में सतत रहती है। ग्रसिका एक सीधी लम्बी नलिका होती है जो यकृत के दो पिण्डों के मध्य होती हुई एक गोलाकार मोटी भित्ति वाले पेशीय थैले में खुलती है जिसे आमाशय (stomach) कहते हैं।

आमाशय (Stomach) : आमाशय एक पेशिय थैले समान संरचना होती है। आमाशय से जुड़ी एक पतली भित्ति की बनी हल्की कुण्डलित छोटे थैले समान संरचना पायी जाती है जिसे सीकम (ceacum) कहते हैं।

आन्त्र (Intestine) : आमाशय आन्त्र में खुलता है जो एक पतली नलिकाकार संरचना होती है। आन्त्र व आमाशय के संगम स्थल पर ही सीकम आमाशय से जुड़ी रहती है। आन्त्र आगे की ओर ग्रसिका के समानान्तर स्थित होती है व अन्त में मलाशय में सम्मिलित हो जाती है। मलाशय गुदा द्वार द्वारा प्रावार गुहा में खुलती है। गुदाद्वार के दोनों ओर एक जोड़ी पत्तीनुमा गुदीय कपाट (anal valves) पाये जाते हैं जिनका कार्य अज्ञात है।

ग्रन्थियाँ (Glands) : सीपिया में निम्न प्रकार की ग्रन्थियाँ पायी जाती है जो आहारनाल से सम्बन्धित होती है (i) जिव्हा की अधर सतह पर एक अधोजिव्हीय ग्रन्थिल ऊत्तक (sublineral glandular tissue) पाया जाता है जिसका कार्य अज्ञात है।

(ii) लार ग्रन्थियाँ (Salivary glands): सीपिया में दो जोड़ी लार ग्रंथियाँ पायी जाती हैं। डनी से एक जोड़ी अग्र लार ग्रन्थियाँ पायी जाती है जो रेतनांग या रेडुला के दोनों ओर खुलती है। एक जोड़ी पश्च लार ग्रन्थियाँ ग्रसिका के दोनों ओर यकृत के सम्मुख स्थित होती है। ये ग्रन्थियाँ एक सह वाहिका द्वारा मुख गुहा में जिव्हा के अग्र सिरे पर खुलती है। वस्तुतः ये लार ग्रन्थियाँ लार का स्रावण नहीं करती है अपितु एक जहरीले पदार्थ का स्रावण करती है जिससे शिकार को निष्क्रिय किया जाता है अतः इन्हें विष ग्रन्थियाँ कहना अधिक उपयुक्त होगा।

(ii) यकृत (Liver): यह एक बड़ी भूरे रंग की पाचक ग्रन्थि होती है जो पश्च लार ग्रन्थियों से प्रारम्भ होकर शरीर के पश्च भाग तक फैला रहती है। यह एक ठोस द्विपालित ग्रन्थि होती है। जिसकी प्रत्येक पालि से एक वाहिका निकलती है। दोनों वाहिकाएँ पृष्ठ वृक्क प्रकोष्ठ (renal chamber) से ऊपर होती हुए परस्पर मिलकर एक आशय में खुलती है जहाँ आमाशय, सीकम व आन्त्र मिलते हैं। इन दोनों यकृत वाहिकाओं में सूक्ष्म आशय पाये जाते हैं जो मिलकर आनाशया (pancreas) का निर्माण करते हैं अतः इन्हें यकत अग्नाशयी वाहिकाएँ कहते हैं।

भोजन व भोजन ग्रहण करने की विधि (Food and feeding mechanism) : सीपिया एक शिकारी व मांसाहारी प्रवृत्ति का जन्तु होती है। यह मुख्य रूप से क्रस्टेशियायी जन्तु, मोलस्कन जन्तु तथा छोटी मछलियों को भोजन के रूप में ग्रहण करती है। शिकार को देखते ही इसके स्पर्शक तेजी से लम्बे होकर चूषकों की सहायता से जीवित शिकार पर चिपक जाते हैं। फिर स्पर्शकों को सिकोड़ कर शिकार को मुखीय भुजाओं की पहुँच (reach) तक लाया जाता है जो शिकार को मजबूती से पकड़ लेती है। फिर शिकार पर लार ग्रन्थियों (विष ग्रन्थियों) द्वारा सावित जहरीला नावण छोड कर उसे निष्क्रिय कर लिया जाता है। निष्क्रिय शिकार के जबड़ों द्वारा टुकड़े कर लिए। जाते हैं व रेतनांग की सहायता से उन्हें निगल लिया जाता है।

पाचन (Digestion) : भोजन का पाचन मुख्य रूप से आमाशय में होता है। आमाशय में भोजन के साथ यकृत व अग्नाशय द्वारा स्रावित पाचक रस मिलाये जाते हैं। अर्द्धपाचित भोजन सर्पिलाकार सीकम में भेज दिया जाता है जहाँ भोजन का पूर्ण पाचन होता है। पाचित तरल भोजन का अवशोषण सीमक द्वारा कर लिया जाता है। शेष अपाचित भोजन आन्त्र में भेज दिया जाता है जहाँ अन्तिम अवशोषण कर अवशेषी भोजन मलाशय में चला जाता है। जहाँ से गुदा द्वार (anus) द्वारा बाहर निकाल दिया जाता है।

सीपिया में यकृताग्नाशय (hepatopancreas) न केवल पाचक रसों का स्रावण करता है अपितु भोजन के अवशोषण व भोजन व उत्सर्जी अपशिष्ट पदार्थों का संग्रह भी करता है।

मसि ग्रन्थि (Ink gland) : जैसा की पूर्व में बताया जा चुका है कि यह एक नाशपाति के आकृति की ग्रन्थि होती है जो आन्तंराग गुम्बद (viscoral dome) की पश्च अधर सतह पर उपस्थित होती है तथा एक वाहिका (मसि वाहिका) द्वारा गुदाद्वार के समीप मलाशय में खुलती है। मसि ग्रन्थि एक थैलेनुमा संरचना में स्थित होती है जिसे मसि थैला (inksac) कहते हैं। मसि ग्रन्थि भूरे या काले रंग के तरल या स्याही (मसि) का स्रावण करती है। जब सीपिया शत्रु को देख कर डर जाती हैं या चोंक जाती है तो यह स्याही को छोड़ती है जिससे एक काला बादल बन जाता है जो एक प्रकार मोक स्क्रीन (धुएँ का पर्दा) का निर्माण करता है जिससे शत्रु को कुछ दिखाई नहीं देता है सीपिया वहाँ से गायब हो जाती है। इस प्रकार यह अपनी रक्षा करती है। यह विधि यह शिकार किडने में भी उपयोग करती है।

श्वसन तन्त्र (Respiratory system)

श्वसन अंग (Respiratory organs): सीपिया में श्वसन के लिए एक जोड़ी जल क्लोम या गिल (ctenidia) पाये जाते हैं जो प्रावार गहा में पार्श्व की तरफ स्थित होते हैं। प्रत्येक गिल एक द्विपिच्छकी (bipinnate) संरचना होती है जिसमें मध्य अक्ष के दोनों ओर कई कोमल पटलिकाएँ (lamellae) पायी जाती है। पटलिकाओं की सतह अत्यन्त सलवटदार होती है जो श्वसन सतह को बढ़ाती है। प्रत्येक गिल में अपनी तरफ के क्लोम हृदय (branchial heart) से अभिवाही क्लो वाहिका (afferent brnachial vessal) द्वारा अशुद्ध रक्त आता है। गिल के अन्दर यह रक्त मही शाखाओं द्वारा पटलिकाओं में होता हुआ गुजरता है व अन्त में शुद्ध या ऑक्सीजनित होकर अपवार क्लोम वाहिका में चला जाता है, जहाँ यह रक्त हृदय के आलिन्द में चला जाता है।

श्वसन क्रिया विधि (Respiratory mechanism) : पेशीय प्रावार लयबद्ध तरीके से। निरन्तर फैलती व संकुचित होती रहती है जिससे एकान्तर क्रम में प्रावार गुहा का आयतन बढ़ता व घटता रहता है। जिसके परिणाम स्वरूप जल निरन्तर प्रावार गुहा में आता व बाहर निकाला जाता रहता है। जब जल गिल के ऊपर होकर गुजरता है तो पटलिकाओं में उपस्थित महीन रक्त वाहिकाओं तथा जल के मध्य ऑक्सीजन व Co, का आदान-प्रदान हो जाता है।

परिसंचरण तन्त्र (Circulatory system):

सीपिया का परिसंचरण तन्त्र विकसित व बन्द प्रकार का होता है। इसमें अवकशिकाओं वा कोटरों का अभाव होता है। विशेष बात यह है कि अशुद्ध व शुद्ध रक्त पूर्ण रूप से पृथक-पृथक रहते हैं। परिसंचरण तन्त्र हृदय, धमनियों, शिराओं तथा केशिका तन्त्र का बना होता है।

सीपिया में तीन हृदय पाये जाते हैं। दैहिक या धमनीय हृदय (systemic or arterial heart) यह आन्तरांग पिण्ड के मध्य में स्थित होता है तथा पेरिकार्डियम में घिरा रहता है। इस हृदय में एक मोटी भित्ति से बना मध्यवर्ती निलय तथा दो पतली भित्ति के बने पार्वीय आलिन्द पाये जाते हैं। सभी प्रकोष्ठ तर्कुरूपी होते हैं। निलय थोड़ा सा संकुचित होकर दो पालियों में बंटा होता है। यह एक बड़े अग्र या शिरस्थ (cephalic) या मुखीय महाधमनी (aorta) तथा एक छोटे पश्च अपमुखीय महाधमनी (aboral aorta) द्वारा क्रमश: शरीर के अग्र व पश्च भाग को रक्त वितरित करता है। महाध मनियाँ शाखित होकर धमनियाँ तथा धमनियाँ केशिकाओं में शाखित होकर अन्त में शिराओं में समाप्त होती है।

सिर से अशुद्ध रक्त (venous blood) एक बड़ी महा शिरा (venacava) द्वारा लाया जाता है जो मलाशय के सम्मुख दाहिनी व बांयी क्लोम शिराओं में विभक्त हो जाती है। ये दोनों क्लोम शिराएँ आगे चल कर तथा कथित क्लोम हृदयों में खुलती है। क्लोम हृदय (brachial hearts) प्रत्येक गिल के आधार पर स्थित होते हैं। प्रत्येक क्लोम हृदय में प्रावार से प्रावारीय शिरा (pallial vein) द्वारा तथा एक उदरीय शिरा (abdominal vein) द्वारा शरीर के पीछे वाले भाग से रक्त लाया जाता है। जनन अंगों व मसि थैले से आने वाली एकल शिराएँ दाहिनी क्लोम शिरा में खुल जाती है। प्रत्येक क्लोम हृदय अभिवाही क्लोम शिरा (afferent branchial vein) द्वारा अपनी-अपनी तरफ के क्लोम को अशुद्ध रक्त वितरित करती है। अभिवाही क्लोम शिरा गिल की मध्य अक्ष से गुजरती है तथा मध्य अक्ष के दोनों ओर शाखित होकर शाखाओं द्वारा पटलिकाओं (lamellae) को रक्त पहुँचाती है जहाँ यह प्रवाहित होने वाले जल से ऑक्सीजन ग्रहण करता है। गिल से शुद्ध रक्त अपवाही क्लोम शिरा (efferent branchial vein) द्वारा दैहिक हृदय के आलिन्द में भेज दिया जाता है जहाँ से निलय में चला जाता है।

सीपिया के रक्त में हीमोसाइनिन (haemocyanin) नामक श्वसन वर्णक तथा अमीबोसाइट्स पाये जाते हैं। हीमोसाइनिन, हीमोग्लोबिन की तरह ऑक्सीजन वाहक श्वसन वर्णक होता है। सोसाइनिन में धात्विक आधार ताम्बा या कॉपर होता है। सीपिया का रक्त, जब अशुद्ध होता है, गहीन होता है तथा शुद्ध या ऑक्सीजनित होने पर हल्का नीला हो जाता है।