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जाने – सिंधु घाटी सभ्यता की मूर्तिकला , हड़प्पा सभ्यता से प्राप्त पत्थर की मूर्ति को क्या कहा गया है ? हड़प्पा से कौन कौन सी मूर्तियां प्राप्त हुई है ?

पाषाण मूर्तिया ंः सैंधव सभ्यता में प्रस्तर मूर्तियां अपेक्षाकृत कम संख्या में प्राप्त हुई हैं। मोहदजोदड़ो से कुल 12 और हड़प्पा से मात्र दो मूर्तियां प्राप्त हुईं हैं। मोहगजोदड़ो से प्राप्त अधिकांश मूर्तियों पर मूलतः लाल अथवा अन्य किसी रंग का लेप था। यहां से प्राप्त पाषाण मूर्तियां अलावस्टर, चूना पत्थर, सेलखड़ी, बलुआ प्रस्तर तथा स्लेटी प्रस्तर से निर्मित की गई हैं। इसी प्रकार हड़प्पा के उत्खनन से प्राप्त दो प्रस्तर मूर्तियां सम्भवतः सैन्धव सभ्यता की कला की सर्वोत्कृष्ट नमूना मानी जा सकती है। यह दोनों मूर्तियां खंडित हैं। इनमें से एक लाल बलुआ पत्थर का धड़ है। यह संभवतः किसी युवा पुरुष की आकृति है तथा मूर्ति के कंधों और ग्रीवा में छिद्र हैं जो इसका संकेत करते हैं कि सिर और भुजाएं अलग-अलग बनाकर यथास्थान जोड़ी गई थी। यह तत्कालीन कला तकनीक को प्रदर्शित करती है। दूसरी मूर्ति चूने के पत्थर की नृत्य मुद्रा की आकृति है। इसमें शरीर के विभिन्न अंगों का विन्यास कला की दृष्टि से अत्यंत आकर्षक है। इसे सिर तथा भुजा बनाकर जोड़ा गया होगा परंतु सम्प्रति केवल छिद्र ही उपलब्ध है। ऐसा प्रतीत होता है कि किसी प्रभावशाली कलाकार ने अपने ध्यान की शक्ति से मूर्तरूप की परिपूर्णता को व्यक्त कर दिया है। भारतीय कला में इस प्रकार की असाधारण अभिव्यक्ति कम उपलब्ध है।
धातु मूर्तिया ंः सिंधु सभ्यता के परिशीलन से यह स्पष्ट ज्ञात होता है कि तत्कालीन कलाकार ‘धातु विद्’ भी थे क्योंकि वे धातु से निर्मित होने वाली मूर्तिकलाओं की विभिन्न निर्माण पद्धति से पूर्ण परिचित थे। ऐसा प्रतीत होता है कि मूर्ति-निर्माण हेतु धातुओं में, विशेष रूप से ‘कांस्य एवं तांबे’ का ही प्रयोग किया जाता था। हड़प्पा संस्कृति में मोहगजोदड़ो से प्राप्त नर्तकी की कांस्य मूर्ति कला की दृष्टि से सर्वाधिक कलात्मक मानी जाती है। यह स्त्री मूर्ति बिल्कुल निर्वस्त्र है और बांई भुजा में एक पात्र है तथा गले में कण्ठाहार है। दुबली-पतली गात यष्टि तथा क्षीण कोटि की मुद्रा, यह संकेत करती है कि यह नृत्यकला में अभ्यस्त किसी नर्तकी की मूर्ति है। वास्तव में इस कांस्य मूर्ति की कलात्मक सुगढ़ता प्राचीन समस्त कला जगत में अनूठी एवं अतुलनीय मानी गई है। इसके अतिरिक्त मोहदजोदड़ो में कुछ सजीव कांसे की पशुओं की आकृतियां प्राप्त हुई हैं जिसमें भैंसा और भेड़ों की मूर्तियां विशेष उल्लेखनीय हैं।
लोथल के उत्खनन से भी तांबें के पक्षी, बैल, खरगोश तथा कुत्ते की मूर्तियां मिली हैं, परंतु इनमें कला की दृष्टि से कुत्ते की आकृति महत्वपूर्ण मानी जाती है। इसी प्रकार कालीबंगा से प्राप्त ताम्र वृषभ मूर्ति कलात्मक रूप से अद्वितीय मानी जा सकती है। इस प्रकार ‘धातु-मूर्तियां’ न केवल सैंधव-सभ्यता की उच्च कोटि की कला का प्रदर्शन करती है अपितु कलाकारों की तकनीकी ज्ञान के वैशिष्टय का भी बोध कराती है।
मृण्मूर्तियां (टेराकोटा) : कला के इतिहास के परिशीलन से यह स्पष्ट रूप से ज्ञात होता है कि विश्व की सभी प्राचीन संस्कृतियों में ‘मृण्मूर्ति-कला’ सर्वाधिक लोकप्रिय रही है। संभवतः यही कारण है कि सैंधव-सभ्यता में उपलब्ध ‘शिल्प-आकृतियों’ में मृण्मूर्तियां प्रचुर मात्रा में पाई जाती हैं। मृण्मूर्तियों का कलात्मक विश्लेषण तीन प्रमुख श्रेणियों-पुरुष मूर्तियों, नारी मूर्तियों एवं पशु-पक्षियों की मूर्तियों में विभाजित करके किया जाता है।
ये सभी मृण्मूर्तियां लाल रंग की बदियां गूथी हुईं तथा ठोस पकाई मिट्टी से निर्मित हैं जिन पर लाल रंग का लेप है परंतु कभी-कभी चटक रंग भी पाया जाता है। ऐसी मृण्मूर्तियों को लोक-कला के अंतग्रत रखा जा सकता है। सांचे में ढालकर निर्मित कतिपय मृण्मूर्तियों के अतिरिक्त अधिकांश मूर्तियां हाथ से बनाई गईं हैं। सांचे में ढालकर निर्मित कुछ मृण्मूर्तियों के अतिरिक्त अधिकांश मूर्तियां हाथ से बनाई गई हैं। इनमें मानव-मूर्तियां ठोस हैं जबकि पशु-पक्षियों की मूर्तियां प्रायः खोखली प्राप्त हुई हैं। मोहगजोदड़ो में नारी मृण्मूर्तियों की अपेक्षा पुरुष-मृण्मूर्तियां बेहद कम प्राप्त हुई हैं। हड़प्पा में भी नारी आकृतियों का बाहुल्य है किंतु पुरुष आकृतियां मोहगजोदड़ो में अपेक्षाकृत अधिक हैं।