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साइमन कमीशन , श्वेत कमीशन क्या है , इंडियन स्टेट्यूअरी का विरोध क्यों किया गया के उद्देश्य क्या थे

जान लीजिये कि साइमन कमीशन/श्वेत कमीशन क्या है , इंडियन स्टेट्यूअरी का विरोध क्यों किया गया के उद्देश्य क्या थे का गठन कब हुआ के अध्यक्ष कौन थे नाम बताइए ?

प्रश्न: इंडियन स्टेट्यूअरी क्या था ? कमीशन (साइमन कमीशन/श्वेत कमीशन) इसका विरोध क्यों किया गया?
उत्तर: ब्रिटिश सरकार ने 1919 के अधिनियम में यह बात की थी कि इसके लागू होने के 10 वर्ष पश्चात् इसकी समीक्षा हेतु एक भारतीय वैधानिक आयोग नियुक्त किया जाएगा। ब्रिटिश सरकार ने 1927 में ही इस अधिनियम की समीक्षा के लिए 7 संसद सदस्यीय आयोग बिठाया। जिसका अध्यक्ष सर साइमन था। इसी के नाम पर इसे साइमन कमीशन कहा जाता है। 3 फरवरी, 1928 को कमीशन का भारत (बम्बई) आगमन तथा चारों ओर इसका विरोध हुआ।
विरोध का कारण: कमीशन में भारतीयों का न होना तथा कमशीन का समय से पहले आना।
लार्ड इरविन ने इस संदर्भ में स्पष्टीकरण दिया कि अधिनियम की समीक्षा ब्रिटिश सदस्यों द्वारा ही की जानी है न की भारतीयों द्वारा। अधिनिमय की समीक्षा से संतुष्ट होने का काम ब्रिटिश संसद से है, यदि इसमें भारतीय सदस्य ले तो कमीशन का आकार बहुत बड़ा हो जाएगा तथा यह अपना कार्य ठीक से नहीं कर पाएगा।
कमीशन का विरोध: 11 दिसम्बर, 1927 को इलाहाबाद सर्वदलीय सम्मेलन में कमीशन के बहिष्कार का निर्णय लिया क्योंकि इसमें एक भी भारतीय नहीं था। कमीशन बम्बई पहुंचा तो काले झण्डे दिखाए गए और साइमन गो बैक के नारे लगाए गए। लखनऊ में खलीकउज्जमा, मद्रास में टी.प्रकाशन, लखनऊ में जवाहर लाल नेहरू व गोविन्द्र वल्लभ पन्त, लाहौर में लाला लाजपत राय ने कमीशन के विरोध का नेतृत्व किया।
कमीशन का समर्थन: मोहम्मद शरीफ के मुस्लिम लीग, मद्रास से जस्टिस पार्टी तथा पंजाब से यूनियनिस्ट पार्टी ने कमीशन का समर्थन किया।

प्रश्न: महात्मा गांधी की ‘बेसिक शिक्षा की अवधारणा‘ के बारे में बताएँ।
उत्तर: गांधीजी ने बेसिक (बुनियादी) शिक्षा की विचारधारा को विकसित किया था, जिससे सामाजिक और व्यक्तिगत रचनात्मक गणों को विकसित करने का अवसर मिला। उनके अनुसार, शिक्षा को आत्मनिर्भर होना चाहिए। इसके तहत शारीरिक प्रशिक्षण, स्वच्छता तथा स्वावलम्बन पर जोर दिया जाना चाहिए। शिक्षा किसी न किसी हस्तकला से अवश्य संबंधित होनी चाहिए। शिक्षा की यह प्रणाली मैट्रिकुलेशन स्तर तक अंग्रेजी के बिना अपनायीं जानी चाहिए। शिक्षा समस्त स्त्री एवं पुरुषों के लिए आवश्यक है। शिक्षा का प्रमुख उद्देश्य व्यक्ति को उसके उच्चतम लक्ष्य की अनुभूति कराना तथा उसे स्वयं में सर्वोत्तम बनने की प्रेरणा देना होना चाहिए। गांधीजी वर्तमान शिक्षा पद्धति से सन्तुष्ट नहीं थे, क्योंकि यह शिक्षा विदेशी भाषा के माध्यम से दी जाती थी और पूर्ण रूप से विदेशी संस्कृति पर. आधारित थी।
प्रश्न: नेहरू का उदारवादी वर्ग के प्रति दृष्टिकोण।
उत्तर: असहयोग आंदोलन (1920) के आरंभ होने से पूर्व कांग्रेस के कुछ नेताओं ने उदारवादी राजनीति अपनाने की वकालत की और वैसा संभव न होने पर उन लोगों ने एक लिबरल फेडरेशन बना ली, जिसके नेता एस.एन. बनर्जी एवं श्रीनिवास शास्त्री जैसे लोग थे। उनकी नीतियों की पंडित नेहरू ने जम कर आलोचना की। नेहरू के अनुसार, लिबरल नेताओं ने ब्रिटिश शासन को एक वरदान के रूप में माना और इसी कारण उन लोगों ने अपने को राष्ट्रीय आन्दोलन के उग्र तरीकों से अलग रखा। असहयोग आन्दोलन के दौरान उन्होंने सरकार का न सिर्फ समर्थन किया, अपितु सरकार का साथ दिया।
प्रश्न: क्या जवाहरलाल नेहरू वास्तव में गांधी की ‘भाषा बोलते‘ थे ? उनके मध्य सहमति एवं असहमति के बिन्दुओं को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर: जवाहरलाल नेहरू को गांधीजी के प्रति काफी श्रद्धा थी। वे गांधीजी को भारतीय प्रणाली पर आधारित भारतीय नेतृत्व देने वाला व्यक्ति मानते थे। गांधी का स्वराज्य का वादा, जिसे नेहरू ने सुनहरी कल्पना बताया था, अविश्वसनीय था। गांधीजी इसे नेहरू के पूर्ण स्वतंत्रता के लक्ष्य के मार्ग में नहीं आने देना चाहते थे। परन्तु दोनों में लक्ष्य तथा कार्य के प्रति निष्ठा की भावना के आधार पर पर्याप्त समानता थी। उन्होंने निरूस्वार्थ रूप से कार्य किया। कई बिन्दुओं पर असहमति होने के बावजूद दोनों एक-दूसरे का पूर्ण सम्मान करते थे। नेहरू, गांधी से अत्यधिक प्रभावित थे तथा उन्हें गांधी के नेतृत्व में अटूट विश्वास था। गांधी भी यह मानते थे कि नेहरू उनकी ही ‘भाषा‘ बोलते हैं।
जलियांवाला बाग की घटना (1919) के बाद गांधी के सम्पर्क में आये नेहरू का भारतीय राजनीति में प्रवेश गांधी द्वारा शुरू किये जाने वाले सत्याग्रह की घोषणा पर हस्ताक्षर करने वाले पहले व्यक्ति के रूप में हुआ था। नेहरू भी गांधी की तरह मानवतावादी विचार, ग्रामीण विकास को प्राथमिकता, जन आंदोलन के महत्त्व एवं देश के प्रति अगाध प्रेम का विचार रखते थे। गांधी द्वारा आरंभ किये गये सभी आंदोलनों जैसे असहयोग आंदोलन, सविनय अवज्ञा आंदोलन एवं रचनात्मक कार्यों को नेहरू का पूर्ण समर्थन प्राप्त था।
लेकिन नेहरू पूर्ण अहिंसात्मक आंदोलन, ट्रस्टीशिप के विचार, किसी भी जन आंदोलन को बीच में ही बंद कर देने, राजनीति में धर्म के महत्व, विशाल उद्योगों का विरोध, वैज्ञानिक सोच की अवहेलना एवं सिर्फ व्यावहारिक शिक्षा की धारणा से असहमति रखते थे। नेहरू ने गांधी के विचारों के विरुद्ध समाजवादी विचार को अधिक समर्थन दिया एवं गांधीजी के लाख मना करने पर भी भारत के विभाजन को स्वीकार कर लिया।
प्रश्न: सविनय अवज्ञा आंदोलन से पूर्व गांधीजी ने गवर्नर जनरल के सामने कौन-सी 11 मांगे रखी? इन पर भारतीय का क्या रुख रहा ?
उत्तर: गांधीजी की 11 सूत्रीय मांगें निम्नलिखित थी जो सविनय अवज्ञा आंदोलन से पूर्व 31 जनवरी, 1930 को गवर्नर जनरल के समाने रखी गई-
1. सैन्य एवं प्रशासनिक खर्चों में 50 प्रतिशत कटौती।
2. राजनीतिक बंदियों की रिहाई।
3. आत्मरक्षा के लिए भारतीयों को हथियार रखने की अनुमति होनी चाहिए।
4. शराब बंदी एवं नशीली वस्तुओं की बिक्री निषेध।
5. रुपये की विनिमय दर 1 सिलिंग तथा 4 पेंस के समान।
6. लगान में 50 प्रतिशत की कटौती।
7. नमक कर व सरकारी एकाधिकार समाप्त।
8. तटीय यातायात रक्षा विधेयक पारित हो।
9. डाक आरक्षण विधेयक पारित हो।
10. जांच एजेसियों पर सार्वजनिक नियंत्रण हो।
11. विदेशी वस्त्रों के आयात को नियंत्रित किया जाए एवं रक्षात्मक शुल्क लगाए जाए।
गांधीजी ने इन 11 सूत्रीय मांगों में कहीं भी स्वराज की चर्चा नहीं की। गांधी जी के इस मांग पत्र पर सरकार ने कोई भी सकारात्मक रुख नहीं अपनाया। फलतः 14 फरवरी, 1930 ई. को साबरमती में कांग्रेस की एक बैठक में गांधी जी के नेतृत्व में सविनय अवज्ञा आंदोलन चलाने का निश्चय किया गया।
प्रश्न: कांग्रेस की स्थापना से जुड़े सुरक्षा कपाट सिद्धान्त को उदारवादियों की आलोचना के साधन के रूप में किस प्रकार प्रयोग किया गया? विवेचना कीजिए।
उत्तर:
1. सर्वप्रथम वेडरबन ने इस सिद्धान्त को बायोग्राफी ऑफ ए.ओ. ह्यूम में 1913 में प्रस्तुत किया।
2. तत्पश्चात्, यंग इण्डिया में 1916 ई. में लाला लाजपत राय ने प्रस्तुत किया।
3. 1938 में सी.एफ. एंड्रयूज व गिरिजा मुखर्जी ने ‘‘राईज ग्रोथ कांग्रेस ऑफ इण्डिया‘‘ में प्रस्तुत किया।
4. 1939 ई. में एम.एस. गोलवलकर ने ‘वी‘ में प्रस्तुत किया।
5. अथशास्त्री आर.पी. दत्त ने ‘इण्डिया टुडे‘ में इसका विश्लेषण किया।
6. बाद में आर.सी. मजुमदार, ताराचन्द जैसे इतिहासकारों ने भी इसका उल्लेख किया।
सुरक्षा कपाट सिद्धान्त में मूल विचार
1. कांग्रेस की स्थापना में डफरिन और ह्यूम का सहयोग था।
2. कांग्रेस की स्थापना को भारतीयों के बीच उभरते हुए असन्तोष के प्रकाश में समझा जाना है।
3. कांग्रेस ब्रिटिश मस्तिष्क की उपज थी।
4. कांग्रेस के माध्यम से ब्रिटिश राज को सुरक्षित रखने का उद्देश्य था। (मूल यही था)- भारतीय असंतोष को कांग्रेस के माध्यम से जानने या मापने का उद्देश्य था, ऐसा इस सिद्धान्त में माना जाता है।
हाल के अध्ययन-
1. डफरिन के निजी पत्रों का अध्ययन व इससे नवीन तथ्यों का सामने आना।
2. डफरिन को कांग्रेस की स्थापना की सूचना ह्यूम के पत्र के द्वारा मिली।
3. मई, 1885 ई. में डफरिन के द्वारा ब्रिटिश अधिकारी रियो (त्मंल) को पत्र और ह्यूम के द्वारा कांग्रेस की स्थापना की चर्चा की।
4. उपरोक्त पत्र में ह्यूम के ‘कांग्रेस‘ शब्द का प्रयोग तथा ह्यूम के कांग्रेस से सावधान रहने का दृष्टिकोण।
5. मई, 1885 के काल से डफरिन का ह्यूम से अलग-अलग रहने का दृष्टिकोण था।
6. मई-जून, 1886 के काल से डफरिन द्वारा ह्यूम की खुली आलोचना करना। डफरिन ने ह्यूम को धूर्त, पागल और बेईमान कहा।
हाल के अध्ययन का विश्लेषण
ए.ओ. ह्यूम की भूमिका
1. ह्यूम की भूमिका मुख्य संगठनकर्ता के रूप में रही व राष्ट्रवादी नेताओं के साथ सहयोगी के रूप में।
2. ह्यूम की भूमिका ब्रिटिश सरकार व कांग्रेस के बीच एक कड़ी के रूप में थी।
3. ह्यूम की भूमिका नवगठित कांग्रेस मंच को सुरक्षा प्रदान करने में व ब्रिटिश विरोध को काम करने में रही।
ह्यूम का राष्ट्रवादी नेताओं से सम्बद्ध होना।
1. कुछ ब्रिटिश अधिकारियों का भारतीयों के प्रति दृष्टिकोण अपेक्षाकृत सकारात्मक रहा। कुछ ब्रिटिश अधिकारी कांग्रेस से जुड़े।
2. ह्यूम का कांग्रेस से संबंध होने को इस परिप्रेक्ष्य में समझा जा सकता है।
3. ह्यूम ने भारतीयों के प्रति कुछ सीमाओं तक सहानुभूतिपूर्ण दृष्टिकोण दर्शाया।
4. ह्यूम ने ‘पीपुल्स फ्रेंड‘ नामक पत्रिका का प्रकाशन किया व इसमें भारतीय समस्याओं पर निबन्ध लिखे।
5. ह्यूम द्वारा कलकत्ता विश्वविद्यालय के स्नातकों को पत्र लिखा जाना व उनसे भारत के विकास में योगदान के लिए आग्रह करना।
6. ह्यूम का भारतीयों के लिए संगठन की स्थापना की दिशा में प्रयास व विभिन्न नामों का सुझाव। जैसेः- ‘हमारी पार्टी‘, ‘अन्तरंग मण्डल‘, ‘इण्डियन नेशनल यूनियन‘।
प्रश्न: भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन में उग्रवाद के उदय के कारणों की विवेचना कीजिए।
उत्तर: बीसवीं शताब्दी के प्रारम्भिक चरण में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में एक नये और तरूण दल का प्रादुर्भाव हुआ, जो पुराने नेताओं के आदर्श तथा ढंगों का कड़ा आलोचक था। वे चाहते थे कि कांग्रेस का लक्ष्य स्वराज्य होना चाहिए, जिसे वे आत्मविश्वास और आत्मनिर्भरता से प्राप्त करें। यही दल उग्रवादी दल कहलाया। उदारवादी प्रतिवर्ष सुधार संबंधी मांगों का प्रस्ताव रखते रहे। लेकिन सरकार ने कांग्रेस के अनुरोध की ओर कोई ध्यान नहीं दिया। फलस्वरूप, नवयुवकों का एक ऐसा दल उठ खड़ा हुआ, जिसने वैधानिक एवं क्रांतिकारी मांगों को अपनाना श्रेष्ठकर समझा।
ऽ भारतीय राजनीति में उग्रवाद के कारणों में सरकार द्वारा कांग्रेस की मांगों की उपेक्षा एक प्रमुख कारण रहा है।
ऽ 1892 ई. के भारतीय परिषद् अधिनियम द्वारा जो भी सुधार किये गये थे, वे अपर्याप्त एवं निराशाजनक ही थे।
ऽ ब्रिटिश सरकार की दमनकारी नीति ने भी उग्रवाद के उदय में प्रमुख भूमिका निभायी।
ऽ भारत की बिगड़ती हुई आर्थिक स्थिति ने भारतीय राष्ट्रीय प्रक्रिया में उग्रवाद के उदय में विशेष योगदान किया। 1896-97 और 1899-1900 के भीषण अकाल और महाराष्ट्र में प्लेग से लाखों लोग मारे गये। सरकारी सहायता कार्य अत्यधिक अपर्याप्त, धीमा और असहानुभूतिपूर्ण था।
ऽ विदेशों में हई घटनाओं का तरूण लोगों पर अत्यधिक प्रभाव पड़ा। भारतीयों के साथ अंग्रेजी उपनिवेशों में, विशेषकर दक्षिण अफ्रीका में हुए दुर्व्यवहार से अंग्रेज विरोधी भावनाएं जाग उठीं। इसके अतिरिक्त इस पर आयरलैंड, ईरान, मिस्र, तुर्की और रूस के राष्ट्रवादी आन्दोलन का भी प्रभाव पड़ा।
ऽ भारतीय राजनीति में उग्रवाद के कारणों में कर्जन की प्रतिक्रियावादी नीतियां भी प्रमुख रहीं। सम्भवतः कर्जन का सबसे निन्दनीय कार्य बंगाल को दो भागों में विभाजित करना था (1905)। अतः इसके विरोध में भारत के राष्ट्रीय आन्दोलन में उग्रवादी आन्दोलन का मार्ग प्रशस्त हो गया।
ऽ अंतर्राष्ट्रीय घटनाएं जैसे अबीसीनिया द्वारा 1896 में इटली को पराजित करना, 1905 ई. में जापान द्वारा रूस को पराजित करना आदि।
ऽ देशी भाषाओं के समाचार पत्रों के बढ़ते प्रसार के कारण राजनीतिक चेतना बढी। कलकत्ता के ‘बंगवासी‘ और पुणे के ‘केसरी‘ और ‘काल‘ जैसे अखबारों ने कांग्रेस की उदारवादी नीति की आलोचना की।
विवेकानन्द, तिलक, अरविन्द घोष जैसे विचारकों ने भी उग्रवाद के मार्ग को प्रशस्त किया। विवेकानन्द ने कहा कि ‘कमजोरी पाप है, कमजोरी मृत्यु है।