मार्शा पी॰ जॉनसन | Marsha P. Johnson

By   June 30, 2020

Marsha P. Johnson , मार्शा पी॰ जॉनसन |

मार्शा प जॉनसन एक वकील भी थे जो समलैंगिक व्यक्तियों के अधिकारों के लिए लड़ रहे थे। इसी के लिए ये मूल रूप से जाने जाते है , जब समलैंगिक व्यक्तियों को अधिकार दिए गए तो माना गया कि यह इनके प्रयासों द्वारा ही संभव हो पाया है |

ये एक एड्स कार्यकर्त्ता भी थे , पहले एड्स को अलग ही नजर से देखा जा सकता था और एड्स के मरीज को हीन भावना से देखा जाता था इसलिए इन्होने इसके खिलाफ भी कार्य किया और लोगो में यह जागरूकता फैलाई की एड्स जैसी बीमारी किसी भी हो सकती है , जिसे एड्स हुआ है उसे लोगो के सपोर्ट की आवश्यकता होती है ताकि उसमे उससे लड़ने की अधिक क्षमता विकसित हो। लेकिन समाज के लोग इस बात को समझने को तैयार न थे और इसलिए उस समय यदि किसी को गलती से या किसी कारणवश एड्स जैसी बीमारी हो भी जाती थी तो वह समाज में बताने से भी डरता था क्योंकि लोग उस समय ऐसी व्यक्ति का बहिष्कार कर देते थे। तो इसलिए इन्होने एड्स कार्यकर्ता के रूप में कार्य किया और लोगो को जागरूक करने का प्रयास किया।

प्रारंभ में ये खुद को “ब्लैक मार्शा” जैसी उपनाम के द्वारा बुलाते थे लेकिन बाद में इन्होने अपना उपनाम बदल लिया और खुद को “ड्रैग क्वीन” जैसे उपनाम के द्वारा सम्बोधित करने लगे। और खुद को ड्रैग क्वीन घोषित करने के बाद उन्होंने अपना नाम “मार्शा प जॉनसन” रख लिया और तब से उन्हें इसी नाम से जाना जाता है।

इनका मूल नाम जॉनसन बताया जाता है लेकिन इन्हें खुद को अपने उपनाम से बुलवाना अच्छा लगता था इसलिए सब इन्हें इनके उपनाम के द्वारा ही सम्बोधित करते है। जब जॉनसन को इनके लिंग के बारे में पूछा गया तो उन्होंने कभी इसका सीधा उत्तर नहीं दिया। वे यह प्रश्न पूछे जाने पर इस पर तंग कस देते है , इसका कारण यह भी माना जा सकता है कि वे दुनिया को यह सन्देश देना चाहते थे कि व्यक्ति को उसके लिंग के आधार पर नहीं पहचाना जाना चाहिए या किसी भी व्यक्ति को लिंग के आधार पर भेदभाव नही करना चाहिए , सभी को स्वतंत्र रूप से जीने का अधिकार होना चाहिए चाहे उसका लिंग कुछ भी , यह केवल पुरुष प्रधान समाज में ही होता है कि महिला रात्री में अकेली कही नहीं जा सकती , इसलिए इस तरह का भेदभाव नहीं होना चाहिए।

ऐसा माना जाता है कि जॉनसन स्वम समलैंगिक थे , और वे यह देख रहे थे कि समाज उन्हें अलग नजर से देखता है इसलिए अपने अधिकारों के लिए वे लड़े और अंत में जीत उनके विश्वास की और उनके इस क्षेत्र में किये गए कार्य की ही हुई।

जॉनसन सामान्यतया अपने बालों में फूल लगाते थे और उनके चहरे पर हमेशा हँसी रहती थी।

इनके पिता का नाम मैल्कम माइकल्स जूनियर था और इनकी माता का नाम अलबर्टा क्लिबोर्न थी। उनके पिता एक फैक्ट्री में कार्य करते थे जो पुर्जो को जोड़कर विभिन्न प्रकार के औजारों का निर्माण करती थी तथा उनकी माता गृहणी थी , अत: हम कह सकते है कि इनका जन्म एक मध्य परिवार में हुआ था जिनके माता पिता मजदूरी करते थे और अपना जीवन यापन करते थे , इनके कुल छ: भाई बहन थे और इनका पूरा परिवार एक साथ अमेरिका के एलिजाबेथ, न्यू जर्सी में रहते थे।

बचपन में इनकी अपने इसाई धर्म में काफी रुची थी और इसलिए ये बचपन में चर्च में काफी समय व्यतीत करते थे। उन्होंने लगभग 5 वर्ष की आयु में अपनी रूचि के अनुसार कपडे पहनने शुरू कर दिए थे लेकिन अपने आस पड़ोस के बच्चो द्वारा उनको छेड़ा जाता था और उनकी मजाक उड़ाई जाती थी।

उन्होंने 1992 में दिए उनके एक इंटरव्यू में बताया कि संभवतः वे सबसे कम उम्र वाले छेड़े जाने वाले यौन उत्पीडन के शिकार हुए बालक थे जिन्हें समाज के दंडी बालकों और युवकों ने परेशान किया।

कथित तौर पर एक बार उनकी माता ने भी उनसे कहा था कि समलैंगिक होना कुत्ते से भी गया गुजरा माना जाता है समाज में।

इन्होने अपनी शिक्षा एडिसन नामक उच्च विद्यालय से 1963 में प्राप्त की और यह स्कुल एलिजाबेथ में ही थी लेकिन अब इस स्कुल का नाम “थॉमस ए. एडिसन करियर और टेक्निकल एकेडेमी” बदल गया है। अपनी स्कूली शिक्षा पूरी होने के बाद उन्होंने अपना घर महज 15 डॉलर और एक कपड़ो का भरा बस्ता साथ में रखकर छोड़ दिया और यहाँ से वे न्यूयॉर्क के एक गाँव में चले गए थे जिसका नाम “ग्रीनविच” था। 1966 में इस गाँव में पहुंचकर वे कई समलैंगिक व्यक्तियों से मिले और उनके अनुभवों को जाना कि समाज उन्हें किस नजर से देखता है और उन्हें किसी भी प्रकार का कोई अधिकार नहीं है न किसी के साथ रहने का , न शादी का आदि। ऐसा जानने के बाद उन्होंने समलैंगिकों के अधिकारों की मांगो के साथ आन्दोलन शुरू किया और अनंत: आज समलैंगिको को विशेष अधिकार प्राप्त है , वे अपनी मर्जी से अन्य समलैंगिक व्यक्ति के साथ शादी और सम्बन्ध आदि भी स्थापित कर सकते है और उनके प्रयासों के फलस्वरूप ही आज समाज ने भी उनके प्रति नजरिये को बदला है।

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वन संरक्षण :-

स्थानीय तथा विश्व के स्तर पर मौसम के नियमन में ऊष्ण कटिबन्धीय वनों की महत्वपूर्ण भूमिका है। उनके विनाश से केवल विश्व के वर्षा चक्र में गड़बड़ी पैदा होने का भय ही नहीं होता जबकि इससे भी अधिक गंभीर खतरा धरती के आन्तरिक वायुमंडल की नाजुक रासायनिकी के टूटने का है।

वन विनाश रोकने के लिए विश्व संस्थान ने संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम तथा विश्व बैंक के साथ मिलकर 800 करोड़ डॉलर की एक पंचवर्षीय योजना बनाई है। इस योजना का उद्देश्य निम्नलिखित है –

  • इंधन की उपलब्धि
  • कृषि वानिकी को प्रोत्साहन
  • जल ग्रहण का नवीकरण
  • ऊष्ण कटिबंधीय वन प्रणाली का संरक्षण
  • अनुसन्धान प्रशिक्षण
  • प्रसार के लिए संस्थाओं को मजबूत बनाना।

इस योजना को स्वतंत्र पर्यावरणविदों ने चुनौती दी है , क्योंकि उनके अनुसार यह योजना वन विनाश का सारा दोष गरीबों के मत्थे मढती है। उनके अनुसार वास्तविकता तो यह है कि वन विनाश के लिए तो मुख्य रूप से वनों के व्यापारिक विकास , बाँध निर्माण तथा माँस निर्यात के लिए पशुपालन उत्तरदायी रहा है। रहे सहे वन तो उन्ही क्षेत्रों में है , जहाँ आदिवासी परंपरागत पद्धति से जीवन यापन कर रहे है। मलेशिया के साचावक क्षेत्र में तो वे चिपको जैसा आन्दोलन भी चला रहे है।

विश्व में विकास की योजनाओं में सर्वाधिक प्राथमिकता पर्यावरण के पुनर्वास को दी जानी चाहिए। इसलिए लिए वनीकरण एक महत्वपूर्ण कार्यक्रम होना चाहिए। वृक्षारोपण में प्रजातियों का चुनाव उनकी बाजार कीमत के बजाय उनके पारिस्थितिकीय लाभों के आधार पर होना चाहिए। उन पेड़ों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए जो मिट्टी तथा पानी का संरक्षण करने के साथ खाद्य , चारा इंधन , जैविक खाद , वनीकरण से भी अधिक आवश्यक है , वनों का विनाश करने वाली विशाल योजनाओं पर पुनर्विचार कर यह कहा जा सकता है कि क्या खनन तथा बाँध निर्माण जैसी महत्वपूर्ण योजनाओं को रोका जाए। निश्चित रूप से इनकी प्राथमिकताएं पुनः निर्धारित की जा सकती है। राष्ट्रीय आवश्यकतायें न्यूनतम अनिवार्य आवश्यक हो , धातुओं का खनन प्राथमिकता के आधार पर पहले उन क्षेत्रों में किया जाना चाहिए जो पर्यावरण की दृष्टि से कम से कम संवेदनशील हो। लकड़ी के खर्चो में किफ़ायत बरतनी होगी तथा उसके विकल्प ढूंढने होंगे। मांसाहार को त्यागे बिना वनों का बचाना कठिन है। दक्षिण अमेरिका के वन तो केवल माँस निर्यात के लिए पशुपालन के लिए उजाड़े जा रहे है।

मारवाड़ का इतिहास (history of marwar) : मारवाड पर राठोड़ो का शासन था। अर्थात  मारवाड़ में “राठौड़” वंश का शासन था।

राठौडो की उत्पत्ति दो प्रकार से बताई जाती है जो निम्न है –

1. कन्नोज (उत्तर प्रदेश) के गहड़वाल वंश से इनकी उत्पत्ति बताई जाती है।

2. दक्षिण भारत के राष्ट्रकूट वंश से इनकी उत्पत्ति बतायी जाती है।

मारवाड़ में शासन करने वाले राठौड़ वंश के प्रमुख राजा निम्न प्रकार से है –

1. राव सिहा (Rao Siha) : 1240 ई. में “पालीवाल” ब्राह्मणों की सहायता के लिए “सिहा” कन्नोज से मारवाड़ आया था।  इन्होने पाली जीता और मारवाड में राठौड़ वंश के पहले राव बन गए।

राव सिहा के शासनकाल में राजधानी “खेड” थी और इनकी चत्तरी “बिठू” नामक स्थान पर बनी हुई है।

2. राव दुहड़ (Rao Doohad) : राव दुहड़ ने लगभग 140 गाँव जीते।  ये अपनी कुल देवी “नागणेची माता” की मूर्ति कर्नाटक से लेकर आये और “नागाणा” नामक स्थान पर इनका मंदिर बनवाया। यह परिहार के खिलाफ युद्ध करता हुआ मारा गया था।

3. राव मल्ली नाथ : इन्होने राजधानी “मेवानगर” को बनाया है।  मेवानगर बाड़मेर में है।  मल्ली नाथ जी पश्चिमी राजस्थान के लोक देवता है और वहां पूजे जाते है , इनके नाम के कारण ही बाड़मेर क्षेत्र को “मालाणी” कहते है। 4. राव चुंडा : राव चुंडा की शादी प्रतिहार के राजा इन्दा की राजकुमारी से हुई थी और इन्दा (प्रतिहार के राजा ) ने अपनी राजकुमारी की शादी में चुंडा को मंडोर दहेज़ में दिया थी।

इसके बाद राठोड़ो की राजधानी मंडोर हो गयी थी।

नोट : गणगोर त्यौहार पर “गिंदोली” के गीत गाये जाते है।

5. राव जोधा (Rao Jodha) : राणा कुम्भा से लड़ता है और अपने राठोड वंश का मारवाड़ पर पुनः अधिकार कर लेता है। राव जोधा ने 1459 ई. में जोधपुर की स्थापना की और इसके बाद जोधपुर को अपनी राजधानी बनाया और जोधपुर में “मेहरानगढ़” किले का निर्माण करवाया।  इस मेहरानगढ़ की नींव करणी माता के द्वारा रखी गयी थी।  जोधा के “बिका” नाम के बेटे ने बीकानेर की स्थापना की।