भक्ति आंदोलन के उदय के क्या कारण थे ? भारत में भक्ति आंदोलन के कारण और स्वरूप पर प्रकाश डालें

By   September 10, 2021

भारत में भक्ति आंदोलन के कारण और स्वरूप पर प्रकाश डालें भक्ति आंदोलन के उदय के क्या कारण थे ? भक्ति आंदोलन के उदय के क्या कारण थे भारतीय समाज पर इसका क्या प्रभाव पड़ा?
प्रश्न: भक्ति आंदोलन के क्या कारण थे ? इसकी मुख्य विशेषताओं की विवेचना कीजिए।
उत्तर: भारत में भक्ति आंदोलन हिंदूधर्म का ही एक अंग था। जिसकी पृष्ठभूमि में सामाजिक-धार्मिक एवं सांस्कृतिक परिष्करण की आवश्यकता प्रमुख कारण था। मुस्लमानों की क्रूर धर्मान्धता ने सांस्कृतिक अन्तश्चेतना को जगाया और असुरक्षा की भावना से मुक्ति का मार्ग भी सांस्कृतिक परिष्करण में नजर आया।
इस्लाम के सूफीवाद की उदार एवं प्रजातांत्रिक भावनाओं ने इस आंदोलन को सार्वदेशिक स्वरूप प्रदान किया। हिंदू मुसलमानों के साथ-साथ रहने से समन्वयवादी दृष्टिकोण पनपा। हिंदूधर्म में पांखड़ों, कर्मकाण्डों एवं संकीर्णता का प्रवेश आदि भक्ति आंदोलन के उदय के कारण रहे।
विशेषताएं
ऽ उपनिषदों एवं साहित्य की अन्य गतिविधियों के एकेश्वरवाद को महत्व दिया।
ऽ भक्ति आंदोलन की लोक काव्यात्मक रचना धार्मिता ने धर्म को संस्कृत जैसी किलिष्टं भाषा के बंधन से मुक्ति दिलाई।
ऽ सामाजिक समानता, कर्मकाण्डों की खण्डनवृत्ति, ईश्वर के प्रति सम्पूर्ण आत्म समर्पण की भावना, लोकभाषा का प्रचार-प्रसार, गृहस्थी में भी संन्यासवाद, धार्मिक सद्भावना, गुरु की महत्ता एवं ईश्वर से उच्च स्थान, मानवमात्र को मोक्ष का अधिकार, जाति-पाँति एवं ऊँच-नीच की भावना का खण्डन तथा एक जनवादी आंदोलन इसकी अन्य प्रमुख विशेषताएं हैं।
ऽ भक्ति आंदोलन निर्गुण (कबीरवाद) और सगुण (मीरा की भक्ति) विचारधाराओं में विभक्त था। इस समय के कुछ प्रमुख संत कबीर, नानक, मीरा, दादू, नामदेव, चैतन्य, रैदास आदि ने समभाव को प्रोत्साहन दिया।
प्रश्न: भक्ति आंदोलन क्या था, भक्ति के वैचारिक आधार के विकास में आचार्यों के योगदान का मूल्यांकन कीजिए।
उत्तर: भक्ति आंदोलन का उदय छठी-सातवीं शताब्दी में हुआ था। इसका आरम्भ दक्षिण भारत में, आलवार एवं नयन द्वारा किया गया था। उन्होंने
धार्मिक समानता के स्थान पर सामाजिक समानता की मांग की। बाद में इसका नेतत्व रामानुजाचार्य के हाथों में आया। उन्होंने विशिष्टाद्वैत
दर्शन के द्वारा धार्मिक क्षेत्र में समानता एवं सामाजिक समानता की मांग की।
13वीं शताब्दी में भक्ति आन्दोलन का प्रसार उत्तर भारत में हुआ। इस समय के प्रमुख आचार्यों में रामानन्द, निम्बार्क, मध्वाचार्य, बल्लभाचार्य, चैतन्य, कबीर, रविदास, शंकरदेव आदि प्रमुख थे। इन आचार्यों ने भारतीय समाज में व्याप्त करीतियों असमानताओं आदि को खत्म करने की मांग की। इन आचार्यों ने जाति व्यवस्था को अस्वीकृत कर दिया तथा हिन्दू धर्म एवं इस्लाम धर्म के बीच सेत का काम किया। जिसके परिणामस्वरूप भारत में मुस्लिम शासन का सामाजिक आधार तैयार हुआ। – निर्गुण भक्तों द्वारा नवीन शिल्पों को मान्यता दिलवाई गई। इसके परिणामस्वरूप उत्पादन को प्रोत्साहन मिला।
भक्ति आंदोलन के आचार्यों ने भारतीय लोक भाषा एवं साहित्य के विकास को प्रोत्साहन दिया जैसे – कबीर ने हिन्दवी तुलसी ने अवधी, सूरदास ने ब्रजभाषा, मल्ला साहब एवं दरिया साहब जैसे सन्तों ने पंजाबी भाषा को प्रोत्साहन दिया साहित्य के अतिरिक्त संगीत के विकास
में भी भक्ति आंदोलन के आचार्यों की सकारात्मक भूमिका रही।
प्रश्न: मध्यकालीन भारत में भक्ति आंदोलन के उदय के पीछे क्या कारण थे? इसके उदय में उन कारकों एवं वैचारिक प्रभावों की विवेचना कीजिए जिन्होंने इसे आगे बढ़ाया?
उत्तर: मध्यकालीन भारत में धार्मिक विचारों के क्षेत्र में एक महान आंदोलन का विकास 15वीं व 16वीं शताब्दी में हुआ. जिन सबंध मुख्य रूप से
हिन्दू धर्म से ही था और जिसमें हिन्दू धर्म एवं समाज के सुधार के साथ-साथ हिंदु धर्म एवं इस्ला। के बीच सहिष्णुता को बढ़ावा देने का
प्रयास भी किया गया।
भक्ति आंदोलन के उद्भव के कारण
1. दक्षिण भारतीय भक्ति की धारा का प्रभाव।
2. इस्लाम की चुनौतियों व भक्ति आंदोलन का इसके प्रत्युत्तर के रूप में उभरना। प्रत्युत्तर के दो पक्ष (ं) सामाजिक-धार्मिक बुराईयों को समाप्त करना व (ं) मौलिक सिद्धांतों को लोकप्रिय बनाकर उसे सुरक्षा प्रदान करना।
3. सामन्ती उत्पीड़न के विरुद्ध जनभावनाओं का विकास।
वे कारक जिन्होंने भक्ति आंदोलन को बल प्रदान किया
(i) पुरातन भक्ति परम्परा का प्रभाव।
(ii) मुख्यतः भागवत पुराण भक्ति परम्परा का प्रभाव।
(iii) 9वीं शताब्दी की वैष्णव रचनाओं का प्रभाव।
(iv) इसकी मुख्य विषय वस्तु विष्णु के विभिन्न अवतारों विशेषकर कृष्ण की भक्ति।
(v) जन्म के आधार पर ब्राह्मणों के प्रभुत्व को नकारा जाना।
(vi) इससे वैष्णव भक्ति धारा का विकास हुआ।
रामानन्द के विचारों का प्रभाव (14वीं-15वीं सदी)
i दक्षिण भारतीय भक्ति व उत्तर भारतीय वैष्णन भक्ति परम्परा के बीच में एक कड़ी के रूप में रामानन्द ने कार्य किया।
iiरामानन्द के द्वारा जाति व्यवस्था को नकारा जाना ब सभी के लिए भक्ति मार्ग को स्वीकार करना।
iii. कबीर, रैदास इत्यादि के एकेश्वरवादी आंदोलन को इन विचारों ने बल प्रदान किया।
iv. नाथपंथी आंदोलन।
v. गैर-रूढ़िवादी आंदोलन था।
vi.. वर्णवादी आदर्शों आदि वर्ण, जाति आदि को नकारा गया।
अपपण् कबीर के एकेश्वरवादी आंदोलन पर इसका प्रभाव पड़ा लेकिन कबीर ने नाथपंथी विचारों को चयनित रूप से स्वीकार किया। राजनीतिक कारक
(i) तुर्की शासन की स्थापना से हिन्दुओं से प्रत्येक क्षेत्र में भेदभाव बरतना।
(ii) ब्राह्मण, राजपूतों का जो एक गठबन्धन प्रभुत्व सामाजिक जीवन पर था, जो कि रूढ़िवादी था तथा गैर-रूढ़िवादी विचारों के विकास के
लिए अनुकूल नहीं था का पतन हो गया। इससे जनभावनाओं के उद्भव को अनुकूल परिस्थितियों का उद्भव हुआ।
(iii) सामाजिक-आर्थिक परिवर्तन जो कि तुर्की शासन की स्थापना का परिणाम था।
(iv) व्यापार-शिल्प नगरीकरण का विकास।
(v) व्यापारी वर्ग, शिल्पी वर्ग का विकास व उनकी आर्थिक संवृद्धि में वृद्धि।
(vi) परम्परागत ब्राह्मणवादी ढाँचे में उनमें (व्यापरी वर्ग) असंतोष था क्योंकि उसमें इनका स्तर निम्न था।
(vii) पंजाब के खत्री, जाट कृषक इत्यादि ने गुरुनानक के आंदोलन के सामाजिक आधार का निर्माण किया।
इस्लामिक विचारधारा का प्रभाव
(i) इस्लाम का आगमन व इससे ब्राह्मण रूढ़िवादिता पर बौद्धिक प्रहार, ब्राह्मण प्रभुत्व पर बौद्धिक प्रहार हुआ।
(ii) सूफी सन्तों की सहिष्णु विचारधारा ने भक्ति आंदोलन में योगदान दिया।
(iii) भक्ति संतों एवं सूफी संतों के विचारों से एक समन्वय दृष्टिकोण का उत्पन्न होना।
उपरोक्त कारकों से
(i) ब्राह्मण विचारधारा विरोधी विचारों के उद्भव की अनकल परिस्थितियों का उदय हुआ जो भक्ति आंदोलन की पहली आवश्यकता थी। (ii) जाति-विरोधी विचारों एवं गैर-रूढ़िवादी विचारों के लिए अनुकूल परिस्थितियों का उत्पन्न होना।
(iii) एकेश्वरवादी आंदोलन जो कि समानता के सिद्धांतों की ओर था, की ओर आकर्षण बढ़ा।
(iv) इस्लाम के अन्तर्गत सूफी आंदोलन का विकास।
(v) सूफी आंदोलन के विभिन्न विचारों का प्रभाव, एक संश्लेषण की स्थिति।
(vi) कबीर, नानक इत्यादि ने विभिन्न विचारों को ग्रहण किया। जैसे –
(a) एकेश्वरवाद
(b) अवतारवाद को नकारा जाना।
(c) समानता व जाति-विरोध।
(d) निर्गुण-भक्ति।
(e) मूर्ति-पूजा का विरोध।
यद्यपि इन्होंने इनके कई रूढ़िवादी तत्वों को नकारा भी।

प्रश्न: एक निडर संत और अन्वेषी के रूप में कबीर का मूल्यांकन कीजिए।
उत्तर: एक संत के रूप में कबीर ने जहां एक और बौद्धों. सिद्धों और नाथों की साधना तथा सुधार परम्परा के साथ व सम्प्रदायों की भक्तिवादिता को अपनाया वहीं एक अग्रज के रूप में समाज को स्पष्ट राह दिखाई। वैरागी होकर भा शुद्ध गहस्थी के उत्तरदायित्वों को निभाया। एक संत के रूप में उन्होंने श्बीजकश् (रमैनी, शबद और साखी) में वाणी सग्रा भक अपने उपदेशों को लोक साहित्य में प्रस्तुत किया।
कबीर की वाणी सामाजिक संघर्ष की ज्वाला है। वे शास्त्रीय शरियत. प्रदर्शन, पाखण्ड आदि के शत्रु थे। उन्होंने हिन्दुआ और मुस्लमानों को खरी-खरी सुनाई है। उनके धार्मिक आडम्बरों पर कठोर आघात किये हैं। उनकी दृष्टि में भगवान व मानवता एक ही है। और जाति, धर्म, सम्प्रदाय आदि के नाम पर मनष्यों के बीच भेदभाव की दीवारें खड़ी करना अक्षम्य अपराध है। उन्होंने हजयात्रियों, हिन्दुतीर्थ यात्रियों और मर्तिपजकों को लताडा। मार्गान्वेषी के रूप में कबीर ने वैचारिक धरातल पर समानता के आडम्बर को आचार के धरातल पर उतारा और वर्ण व्यवस्था के मजबूत किलों की दीवारों को ध्वस्त किया तथा कथित हिंदु-मुस्लिम ठेकेदारों को उनकी पाखंडवत्ति, अलगाववृत्ति, लालचवृत्ति और अज्ञानवृत्ति पर गहरी चोट करते हुए सरेआम निर्वस्त्र कर दिया ताकि लोग उनका घिनौना रूप देखकर साम्प्रदायिक एकता का सन्मार्ग चुन ल। साथ ही कबीर ने निर्गुण भक्ति की सादगी का ऐकेश्वाद और प्रेम के आधार पर प्रचार किया। इसलिए मैकोलीफ ने कबीर को एक निडर अन्वेषी संत कहा।