पाइला का उत्सर्जी तंत्र क्या है , Excretory System of pila in hindi उत्सर्जन की क्रियाविधि (Physiology of excretion)

जाने पाइला का उत्सर्जी तंत्र क्या है , Excretory System of pila in hindi उत्सर्जन की क्रियाविधि (Physiology of excretion) ?

उत्सर्जी तंत्र (Excretory System)

पाइला में उत्सर्जन के लिए एक वृक्क पाया जाता है जो हृदयावरण के पीछे स्थित होता है। सभी लेमिलिडेन्स की तरह खोजकर्ता के नाम पर बोजेनस का अंग (Organ of Bojanus) कहत हैं। पाइला में बोजेनस का अंग या वृक्क मोटी भित्ति की थैलेनुमा संरचना होती है। पाइला में वृक्क बायीं तरफ ही पाया जाता है। दाहिनी तरफ का वृक्क या तो विलुप्त हो गया है या जनन वाहिना में रूपान्तरित हो गया होता है। यह वृक्क प्रगुहावाहिनी (coelomo duct) का रूपान्तरण होता है। यह एक तरफ तो हृदयावरणी गुहा (pericardial cavity) से जुड़ा रहता है तथा दूसरी तरफ से यह बाहर खलता है। पाइला का वृक्क या बोजेनस का अंग दो भागों का बना होता है

  1. अग्र वृक्क प्रकोष्ठ (Anterior renal chamber)
  2. पश्च वृक्क प्रकोष्ठ (Posterior renal chamber)
  3. अग्र वृक्क प्रकोष्ठ (Anterior renal chamber)

यह लाल रंग की अण्डाकार संरचना होती है जो हृदयावरण (pericardium) तथा पश्च वृक्क प्रकोष्ठ के सामने स्थित होता है। यह प्रकोष्ठ एक तरफ तो दरारनुमा छिद्र द्वारा प्रावार गुहा के क्लोम कोष्ठ में खुलता है तथा दूसरी तरफ एक आंतरिक छिद्र द्वारा पश्च वृक्क प्रकोष्ठ में खुलता है। इस प्रकोष्ठ की छत से अनेक त्रिभुजाकार पत्ती समान संरचनाएँ इसकी गुहा में लटकी रहती हैं, जिन्हें पटलिकाएँ (lamellae) कहते हैं। इन पटलिकाओं की उपस्थिति के कारण इस प्रकोष्ठ की गुहा बहुत समानीत (reduced) हो जाती है। इस तरह की पटलिकाएँ इस प्रकोष्ठ के फर्श पर भी पायी जाती हैं। इस प्रकोष्ठ की छत में एक मध्य अक्ष पायी जाती है, जिसके दोनों तरफ ये पटलिकाएँ लटकी रहती हैं, इसे अपवाही वक्क कोटर (efferent renal sinus) कहते हैं। इसी तरह इस प्रकोष्ठ के फश पर भी मध्यवर्ती अक्ष पायी जाती है जिसे अभिवाही वृक्क कोटर (afferent renal sinus) कहते हैं। यह कोटर परिआंत्र कोटर (peri intestinal sinus) की दाहिनी शाखा होती है तथा यह कई शाखाओं द्वारा पटलिकाओं की दोनों सतहों को रक्त पहुँचाती है।

  1. पश्च वृक्क प्रकोष्ठ (Posterior renal chamber) : यह एक हुक समान भूरे रंग की चौड़ी सरंचना होती है। यह अग्र वृक्क प्रकोष्ठ तथा मलाशय एवं हृदयावरण तथा पाचक ग्रन्थि के मध्य स्थित होता है। इसकी गुहा काफी बड़ी होती है जिसमें आंत्र तथा जनन वाहिनी की कुछ कुण्डलियाँ पड़ी रहती हैं। इस प्रकोष्ठ की छत में अनेक रक्त वाहिकाओं का जाल बिछा रहता है जो अपवाही एवं अभिवाही वृक्क वाहिकाओं के विभाजन से बना चित्र 14 : पाइला के वृक्क कक्ष होता है। यह एक तरफ अग्र वृक्क प्रकोष्ठ में तथा दूसरी तरफ हृदयावरणी गुहा में खुलता है। हृदयावरणी गुहा में खुलने वाले छिद्र को वृक्क-हृदयावरणी छिद्र कहते हैं। पश्च वृक्क प्रकोष्ठ हृदयावरण (pericardium) से एक खड़ी पट्टिका द्वारा अलग रहता है जिसे वृक्क-हृदयावरणी पट्टिका (reno-pericardial septum) कहते हैं।

उत्सर्जन की क्रियाविधि (Physiology of excretion)

पाइला अमोनोटेलिक तथा यूरिकोटेलिक दोनों प्रकार का होता है क्योंकि यह अपने नाइट्रोजनी अपशिष्ट पदार्थों को अमोनिया एवं यूरिक अम्ल के रूप में शरीर में बाहर निकालता है। वृक्क के

दोनों कक्षों में रक्त केशिकाओं का जाल बिछा रहता है अतः ये रक्त से अपशिष्ट पदार्थों को अलग हो । ये अपशिष्ट पदार्थ अग्र वृक्क प्रकोष्ठ में उपस्थित छिद्र द्वारा प्रावार गुहा में छोड़ दिये जाते है  जहाँ से ये शरीर को बाहर निकाल दिये जाते हैं। जल में रहते हए यह अपने उत्सर्जी पदाथा अमोनिया के रूप में त्यागता है, जबकि स्थलीय निवास के दौरान यह उत्सर्जी पदार्थों को जल लनशील अर्द्ध ठोस यूरिक अम्ल के रूप में बाहर निकालता है तथा जल संरक्षण के लिए अनुकूलन प्रकट करता है।