दलविहीन लोकतंत्र का विचार किसने दिया ? दलविहीन लोकतंत्र’ किसके मूल उद्देश्यों में है

जाने दलविहीन लोकतंत्र का विचार किसने दिया ? दलविहीन लोकतंत्र’ किसके मूल उद्देश्यों में है ?

उत्तर : दलहीन लोकतंत्र का सिद्धान्त जे.पी. (जयप्रकाश नारायण) द्वारा दिया गया था |

जे.पी. (जयप्रकाश नारायण) ने कहा कि भारत की वर्तमान राजनीतिक व्यवस्था हुआ देनी चाहिए व नीचे से ऊपर तक पंचायतें होनी चाहिए। सबसे नीचे ग्राम पंचायत, उनके ऊपर जिला पंचायतें, फिर क्षेत्रीय पंचायतें व सबसे ऊपर राष्ट्रीय पंचायतें हो कोई चुनाव न हो न पार्टी हो। बल्कि सच्चे समाज सेवकों का चयन किया जाना चाहिये जो सभी पंचायतों को चलायेंगे। सभी का जीवन सादा होगा, आवश्यकतायें सीमित होंगी और वे संन्यासियों की तरह सार्वजनिक विषयों का प्रबंध करेंगे इसी का नाम ‘दलहीन लोकतंत्र का सिद्धान्त‘ है।
चूँकि बिनोबा भावे ने भू-दान, ग्राम दान, संपत्ति दान, श्रमदान के आंदोलन चलाये। इसलिए जे.पी. ने इस आंदोलन में भाग लिया अतः उन्हें जीवनदानी कहा जाने लगा। लेकिन 1973 में जे.पी. ने पौनार आश्रम छोड़ दिया व सक्रिय राजनीति में लौट आये। अब उन्होंने भ्रष्ट कांग्रेस व भ्रष्ट इंदिरा आंदोलन चलाये। गुजरात में युवकों की नव निर्माण समिति बनी जिसके सदस्यों ने विधायकों के जबरदस्ती, त्यागपत्र लेने के कारण विधान सभा भंग कर दी। इस स्थिति में इंदिरा ने संविधान में 33वाँ संशोधन किया व कहा कि सदन का अध्यक्ष त्यागपत्र तभी स्वीकार करेगा जब वह आश्वस्त हो जाये की त्याग पत्र स्वयं की इच्छा से दिया है।
1974 में जे.पी. ने सम्पूर्ण क्रान्ति का आह्वान किया अर्थात् 7 क्षेत्रों में आमूल परिवर्तन किया जायेगा। ये क्षेत्र हैं राजनैतिक, शैक्षिक, सांस्कृतिक, आर्थिक, मनोवैज्ञानिक या भावनात्मक, सामाजिक, कानूनी। स्थिति बिगड़ती चली गई जिससे 25 जून, 1975 में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने देश में आपातकाल लागू कर दिया। तब जे.पी. व इनके सहयोगी जेल में भेजे गए। तिहाड़ जेल में 1977 जे.पी. ने जनता पार्टी बनाई, जेल से छूटने के बाद जे.पी. ने इस पार्टी से 1977 का चुनाव लड़कर विशाल सफलता पाई। तभी केन्द्र में मोराराजी देसाई (प्रधानमंत्री) की सरकार बनी। इसमें चैधरी चरणसिंह व बाबू जगजीवन राम कार्यवाहक प्रधानमंत्री थे। कुछ समय बाद जे.पी. की मृत्यु हो गई परन्तु जनता क्रान्ति के जन्मदाता उन्हीं को कहा जाता है। जयप्रकाश का समाजवाद, सम्पूर्ण क्रान्ति, दलहीन लोकतंत्र आज भी प्रसिद्ध हैं।

प्रश्न: महात्मा गांधी के विभिन्न पक्षों पर विचारों को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर: गांधीजी को कर्मयोगी कहते हैं क्योंकि इन्होंने जो कहा उसे करके दिखाया। गांधीजी ने ग्यारह मूल्य बताये जो मनुष्य को अपनाने चाहिए। वे हैंः- (1) सत्य, (2) भय, (3) अहिंसा, (4) अपरिग्रह, (5) आस्वाद (संयम), (6) आस्तेय (चोरी न करना), (7) ब्रह्मचर्य, (8) स्वदेशी, (9) अस्पृश्यता निवारण, (10) सर्वधर्म समभाव, (11) श्रम आजीविका (मेहनत की रोटी) इन्हीं को एकादश व्रत कहा है।
अराजकतावाद पर विचार
बिन्दुओं को पढ़कर लगता है कि गाँधीजी दार्शनिक अराजकतावादी या ईसाई अराजकतावादी या शान्तिप्रिय अराजकतावादी हैं। अराजकतावाद एक सिद्धान्त है जो वर्गहीन व राज्यविहीन समाज चाहता है जिसमें मानव को पूर्ण मुक्ति मिल जाये। मार्क्सवाद अन्त में अराजकतावाद है। अराजकतावादी विचारक दो प्रकार के होते हैं।
(प) हिंसात्मक या खूनी अराजकतावादी जैसे फ्रांस के प्रोधा, रूस के बाकुनिन जो खूनी तरीकों से क्रान्ति करके वर्गहीन व राज्यविहीन समाज बनाना चाहते थे और उस स्वर्णिम समाज को स्थापित कर जिसमें मानव को पूर्ण मुक्ति मिलेगी फिर सारा काम लोगों की, स्वैच्छिक संस्थाएं करेगी।
(पप) दूसरे अराजकतावादी शान्तिप्रिय है जैसे – इंग्लैण्ड के रस्किन, रूस के टॉल्स्टाय व अमेरिका के जो कहते है कि शान्ति पूर्ण तरीकों से स्वर्णिम समाज स्थापित किया जाये। गांधी इसी वर्ग में आते हैं इसलिए उन्हें दार्शनिक अराजकतावादी कहते हैं। क्योंकि गाँधीजी के रामराज्य के ना वर्ग है ना राज्य है। गांधीजी के ये विचार उनकी पुस्तक हिन्द स्वराज में हैं जिसमें वो राज्य और सरकार की निंदा करते है व लिखते हैं कि राज्य हिंसा का संगठित रूप है, ये शोषण व उत्पीड़न का यंत्र है। व्यक्ति के पास आत्मा है लेकिन राज्य आत्माविहीन मशीन है इसलिए व्यक्ति व राज्य एक-दूसरे के विरोधी हैं। लोग संसद की बहुत प्रशंसा करते है परन्तु गांधी उसे बातों की दुकान कहते हैं, ये कोई उपयोगी काम नहीं करती। ये बाँझ महिला की तरह निरउत्पादक है और ये अविश्वसनीय है क्योंकि जो प्रधानमंत्री आता है वो पिछले कामों को उलट-पुलट कर देता है।
सरकार सत्ता का रूप है शक्ति का रूप है व शक्ति मनुष्य को दूषित कर देती है। जो सरकार में नहीं हैं उनका आचरण ठीक होता है लेकिन जो शासन में है वे सत्ता के नशे में भ्रष्ट हो जाते हैं। अतः ये कहावत ठीक है कि सत्ता मनुष्य को भ्रष्ट कर देती है। इसलिए न सत्ता न सरकार होनी चाहिए लोग अपना काम स्वयं करे वे सरकार पर निर्भर ना रहे। इसलिए लोगों को धीरे-धीरे सरकार से अपना नाता तोड़ देना चाहिए।
गांधी का रामराज्य
गांधीजी का रामराज्य एक वर्गहीन व राज्यविहीन समाज है जिसमें हर गांव शहर स्वावलंबी हैं हर व्यक्ति सत्याग्रही है इसलिए कोई किसी का शोषण व अत्याचार कर ही नहीं सकता। समाज में पूर्ण समानता है राजा रंक बराबर हैं और पूर्ण न्याय की दशा है जिसमें कुत्ते तक के साथ न्याय होता है। इसमें सेना को कोई स्थान नहीं है। लेकिन यदि दूसरा राज्य आक्रमण करता है तो लोग अपनी शान्ति सेना बना सकते हैं। संक्षेप के अब स्वराज की पराकाष्ठा रामराज्य है।
आलोचना: अराजकतावादी सिद्धान्त एक कल्पना है जो ना कभी साकार हुई ना होगी। ये केवल-विचारों की उड़ान है इसलिए गांधी का रामराज्य भी एक सुन्दर सपने की तरह है जिसका केवल शैक्षिक महत्व है।
धर्म व राजनीति का गठबंधन अर्थात् शुद्धीकरण आध्यात्मीकरण: मैकियावली व हॉब्स ऐसे विचारक हैं जिन्होंने राजनीतिक सत्ता व सत्ता के लिए संघर्ष है व इस संघर्ष में सब कुछ उचित है। परन्तु गांधी का विचार भिन्न है क्योंकि वे धर्म से राजनीति को जोड़ते थे। गांधी कहते हैं कि राजनीति का अर्थ सत्ता के लिए संघर्ष नहीं बल्कि निस्वार्थ भाव से समाज सेवा है, इसी को बिनोबा लोकनीति कहते हैं। गाँधीजी के अनुसार धर्महीन राजनीति मौत का जाल है जो आत्मा तक को मार देती है। इसलिए उन्होंने राजनीति में सत्याग्रह व अहिंसा का प्रयोग किया। अगर मैकियावली ने राजनीति का भददीकरण किया तो गांधी ने राजनीति का आध्यात्मीकरण किया।
साधन और साध्य: किसी लक्ष्य की प्राप्ति के लिए कुछ साधन अपनाये जाते हैं। इस बारे में मैकियावली, लेनिन सभी साधानों को उचित मानते है जिनसे लक्ष्य पूरा किया जा सकता है। क्योंकि लोग सफलता को देखते है। लेकिन गांधी कहते हैं कि यदि बीज कड़वा है तो फल भी कड़वा होगा। इसलिए अच्छे लक्ष्य के लिए अच्छे साधनों का प्रयोग किया जाना चाहिए। इसी वजह से गांधी के नेतृत्व में जितने सत्याग्रह हुये उनमें हिंसा का कोई स्थान नहीं था। जब 1922 के चैरी-चैरा में हिंसा हो गई तो गांधीजी ने अपना असहयोग आंदोलन स्थगित कर दिया।
अहिंसा: अहिंसा बहुत पुराना विचार है जिसे बुद्ध, महावीर स्वामी, ईसामसीह तथा अनेक महात्माओं ने दिया है। परन्तु इन सभी का विचार नकारात्मक है गांधी ने इसे सकारात्मक मोड़ दिया। अहिंसा तीनों रूपों में होनी चाहिए अर्थात् मन, वचन, कर्म तीनों शुद्ध होने चाहिए। अहिंसा का अर्थ कायरता नहीं हैं। इसलिए अगर कोई किसी के प्राण लेना चाहता है या उसका मान सम्मान खतरे में है तो अहिंसा कहती है कि विरोधी से टक्कर ली जाए क्योंकि ऐसा ना करना कायरता होगी। गांधी ये भी कहते हैं कि अगर कोई प्राणी बहुत दुरूखी है और कोई उपाय नहीं है तो उसे मार देना भी अहिंसा है।
सत्याग्रह: सत्याग्रह का मतलब है सत्य पर डटा रहना। लेकिन सत्याग्रह वही कर सकता है जो ईश्वर में विश्वास करता हो। क्योंकि सत्य ही ईश्वर है इसलिए मनुष्य को अन्याय के सामने सर्मपण नहीं करना चाहिए। सत्याग्रह का कोई भी रूप हो सकता है जैसे – हड़ताल, जूलूस, प्रदर्शन, घटना, बहिष्कार, असहयोग, कानून को तोड़ना इत्यादि लेकिन इसमें दो जरूरी शर्ते हैं –
(प) विरोधी को शत्रु ना समझा जाये बल्कि उसका हृदय जीत लिया जाये।
(पप) अहिसात्मक साधनों का ही प्रयोग किया जाना चाहिए। इसलिए गांधी ने कहा है कि उनका सत्याग्रह अरविन्द के निष्क्रिय प्रतिरोध से बिल्कुल भिन्न है।
न्यास का सिद्धान्त: निजी संपत्ति व्यवस्था के बारे में भिन्न-भिन्न विचार है। उदारवादी विचार के समर्थक लॉक हैं जिसके अनुसार व्यक्ति को अपनी संपति पर पूरा अधिकार है राज्य उसमें कोई हस्तक्षेप नहीं कर सकता।
मार्क्स: निजी संपति ही शोषण का तंत्र है इसलिए इसे सार्वजनिक संपति में बदल देना चाहिए। समाजवादी विचार (समर्थक लॉस्की) निजी संपति व्यवस्था पर राज्य का कठोर नियंत्रण होना चाहिए। यदि आवश्यक हो तो लोकहित में उसका राष्ट्रीयकरण कर लेना चाहिए। परन्तु गांधी इन तीनों विचारों को अस्वीकार करते हैं। वे कहते हैं कि जब तक स्वार्थ नहीं है उसकी रक्षा नहीं हो सकती है। इसलिए निजी संपत्ति होनी चाहिए। निजी संपति में लोगों की मानसिकता बदल देनी चाहिए ताकि वे स्वयं को संपति का मालिक न समझे। क्योंकि संपत्ति समाज की होती है परन्तु नेहरू कहते हैं कि ‘गांधी का ये विचार प्लेटों के आदर्श राजा की तरह काल्पनिक है।‘
स्वदेशी और विश्व बंधुत्ववाद का मिलन: गांधी ने इसका नाम श्समुद्रिक लहरों का सिद्धान्तश् कहा है गांधीजी हिन्दू स्वराज में कहते हैं कि व्यक्ति को अपने परिवार पर, परिवार को गांव पर, गांव को नगर पर, नगरों को प्रांत पर प्रान्तों पर, प्रान्तों को देश पर तथा देश को विश्व पर बलिदान कर देना चाहिए। जैसे समुद्र की लहरों के चक्र बनते हैं, चक्र के भीतर चक्र बनकर उसी समुद्र में रहते हैं। इसलिए मनुष्य को परिवार, गांव, नगर, प्रान्त, देश, विश्व में लयित हो जाना चाहिए। ये विचार रॉय व टैगोर के विश्व-बंधुत्व से मिलता है परन्तु इसका मूल स्वदेशी हैं।
शिक्षा प्रणाली: 1937 में गांधी ने अपनी शिक्षा प्रणाली दी क्योंकि उस समय वे वर्धा आश्रम में थे। इसलिए इसे वर्धा शिक्षा प्रणाली भी कहते है। इसमें गांधी ने उदाहरण का सहयोग लिया है – दिमाग, दिल व हाथ। बच्चों को नैतिक शिक्षा दी जाये ताकि उनका चरित्र निर्माण हो, अंग्रेजी शिक्षा पर ज्यादा जोर ना दिया जाये और उन्हें कोई दस्तकारी सिखाई जाये ताकि वे स्कूल छोड़ने के बाद कोई उपयोगी काम कर सके। कांग्रेस की प्रान्तीय सरकारों ने इस प्रणाली को लागू किया।
सर्वोदय (गांधीवादी समाजवाद): गांधीजी पाश्चात्य समाजवाद के आलोचक थे क्योंकि वो पूर्णतया भौतिकवादी सिद्धान्त है। जिसमें ईश्वर, सत्य, आत्मा व अहिंसा को कोई जगह नहीं है, इसलिए गांधी ने एक नया शब्द ‘सर्वोदय‘ बनाया अर्थात् सबका उदय इसके तीन आयाम हैं-
(प) नैतिक या आध्यात्मिक आयाम: मनुष्य को सत्य व ईश्वर में पूरा विश्वास रखना चाहिए व हमेशा अहिंसा का पालन करना चाहिए।
(पप) आर्थिक आयाम: निजी व्यवस्था दोषपूर्ण है लेकिन यदि संपत्ति वालों की मानसिकता बदल दी जाये तो इसके दोष दूर हो सकते हैं। इसलिए विनोबा ने श्रमदान, भू-दान, संपत्तिदान आंदोलन चलाये।
(पपप) राजनीतिक आयाम: दुषित करता है, अतः सत्ता का त्याग होना चाहिए। राष्ट्रीय दल नहीं होने चाहिए लोगों को सच्चे हृदय से समाज सेवा करनी चाहिए, ताकि स्वराज को राम राज्य में बदला जा सके।
लोकनीति: राजनीति का अर्थ है सत्ता व सत्ता के लिए संघर्ष है। लोकनीति का अर्थ है सत्ता का त्याग व निस्वार्थभाव से समाज की सेवा।
वर्णाश्रम व्यवस्था: अर्थात् हिन्दु समाज में चार वर्ण हैं – ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्व व शुद्र। लेकिन उनके बीच ऊंच-नीच का भेदभाव नहीं होना चाहिए। यही व्यवस्था ठीक है। वर्णाश्रम व्यवस्था में एक गुण कार्यों का विशेषज्ञीकरण है।