अद्वैतवाद के सिद्धांत के प्रतिपादक कौन थे , अद्वैतवाद का सिद्धांत किसने दिया किसे कहते हैं परिभाषा क्या है

By   October 7, 2021

अद्वैतवाद का सिद्धांत किसने दिया किसे कहते हैं परिभाषा क्या है अद्वैतवाद के सिद्धांत के प्रतिपादक कौन थे ?
महत्वपूर्ण विचार एवं पद
अद्वैत
‘अद्वैत’ अर्थात् दूसरा नहीं, इस दर्शन के प्रवर्तक शंकराचार्य थे। उनके अनुसार ईश्वर एक है, उसके अतिरिक्त कोई दूसरा नहीं, कोई दूसरी सत्ता नहीं। सिवाय ईश्वर के और कोई मौजूद नहीं। यानी ‘एकमेवद्वितीयम्’। वह निर्गुण है अर्थात सब गुणविशेषताओं से रहित। ईश्वर के सिवा जो अन्य सभी सत्ताएं दिखती हैं, वह सब माया हैं। मनुष्य जब तक अज्ञानता से ग्रस्त है, उसे विश्वास करना पड़ता है कि माया वास्तविक है और व्यावहारिक जीवन में उसे इस परिकल्पना के अनुसार कार्य करना पड़ता है। किंतु जो जागता है और मोक्ष प्राप्त करना चाहता है, उसके लिए आवश्यक है कि वह अज्ञानता का आवरण हटा, और वास्तविक एकात्मता की ओर दृष्टिपात करे। यह तभी संभव है जब आध्यात्मिक साधना द्वारा इंद्रियों और प्रत्यक्ष ज्ञान का दमन नहीं होता। अतः ‘सच्चिदानंद’ बनने की आवश्यकता है।
अकाल तख्त
सिक्खों की सर्वोच्च धार्मिक सत्ता तख्त है,जो पंथ से जुड़े मुद्दों पर गिर्णय लेता है। तख्त के हुक्मनामे सिक्खों को मानने पड़ते हैं। चार प्रमुख तख्त हैं अमृतसर में अकालतख्त, आनंदपुर में तख्त केशवगढ़ साहिब, पटना में तख्त पटना साहिब और महाराष्ट्र के नांदेड़ में तख्त हजूर साहिब।
बोधिसत्व
महायान सम्प्रदाय के बौद्धों के अनुसार लोगों को बुद्ध होने के लिए सिर्फ अपने प्रयासों पर ही निर्भर नहीं रहना है। उन्हें बोधिसत्व की सहायता मिलेगी, जो इस दुनिया में औरों की मुक्ति हेतु आए हैं। बोधिसत्व वही है, जो बुद्ध बनना चाहता है ज्ञान और सद्गुणों के बल पर, सभी को अपने साथ निर्वाण प्राप्त कराने हेतु कार्य करके और प्रेम व अनुराग के कार्यों के आधार पर दुःख निवारण हेतु निर्वाण को स्थापित करके। पारम्परिक रूप से विख्यात बोधिसत्व हैं अवलोकितेश्वर, अमिताभ, वैरोचन, मंजूश्री और सुमंतभद्र। मैत्रेयी अभी तुषित स्वग्र में हैं और किसी भारी विपदा के समय इस विश्व को बचाने हेतु यहां आने की प्रतीक्षा में हैं।
दीन-ए-इलाही
मुगल सम्राट अकबर ने इस मत को चलाया था। 1582 ई. में सभी धर्मों के सार पर आधारित यह मत प्रतिपादित कर अकबर ने ऐसी व्यवस्था की कि इसमें कोई भी शामिल हो सकता था। शामिल होने की बाध्यता भी नहीं थी। कहा जाता है कि स्वयं बीरबल इससे अलग रहे। बहरहाल, यह मत सुलह-कुल के सिद्धांत पर आधारित था। इसमें एक सर्वशक्तिमान ईश्वर की कल्पना की गई थी। इसे मानने वालों को निर्धारित आचार संहिता के दस नियमों को मानना पड़ता था। कई कारणों से यह मत अकबर के ही इर्द-गिर्द रहा और उसकी मृत्यु के पश्चात् समाप्त हो गया।
द्वैत
13वीं शताब्दी में माधव ने ‘द्वैत’ दर्शन का प्रतिपादन किया। इसके अनुसार ब्रह्म और सृष्टि अलग-अलग हैं। उपनिषदों पर आधारित माधव के दर्शन में यह कहा गया कि ईश्वर सर्वोच्च है और वही आत्मा का जन्मदाता है, किंतु ऐसा नहीं है कि सबमें उसी का अस्तित्व है। ‘सब कुछ वही है’ इसे नहीं माना गया, बल्कि ‘उसी से सबकुछ है’ का सिद्धांत माना गया।
हिजरत
पैगम्बर मुहम्मद का 622 ई. में मक्का से मदीना जागा हिजरत कहलाता है और यहीं से हिजरी संवत् प्रारंभ होता है।
लोकायत
चार्वाक से जुड़े इस मत ने आत्मा की उपस्थिति या चेतना के अस्तित्व को नकारा है, जिसको हिंदू दर्शन के सभी अंगों ने स्वीकार किया है। इसका मानना है कि चेतना और कुछ नहीं बल्कि कुछ तत्वों का मिश्रण है। मृत्यु के बाद कुछ शेष नहीं रहता। वेदों की अमोधता, कर्म एवं पुगर्जन्म के सिद्धांतों को भी यह मत नहीं मानता है।
मीमांसा
हिंदुओं के षड्दर्शन में से एक मीमांसा दर्शन में वेदों को ही आधार माना गया है। 200 ई.पू. में जेमिनी द्वारा स्थापित इस दर्शन का मानना है कि वेद अपौरूषेय हैं अर्थात् इन्हें किसी पुरुष या मनुष्य ने नहीं बनाया। इसलिए इसकी सत्यता किसी भी संदेह से परे है और उनमें दिए गए निर्देशों का अवश्य पालन होना चाहिए। किंतु इनका सम्बंध वेदों के धर्मविज्ञान या नीतिशास्त्र से नहीं बल्कि केवल कर्मकाण्डों, धर्मानुष्ठानों, यज्ञ, भजन और प्रार्थनाओं से सम्बंधित श्लोकों से है। इस दर्शन के अनुसार आत्मा, जो शाश्वत है और शरीर से अलग है, कर्मकाण्डों के माध्यम से शुद्ध होती रहनी चाहिए क्योंकि कर्मकाण्डों के बिना ज्ञान अधूरा है।
न्याय
गौतम द्वारा अंग्रेजी कैलेण्डर प्रारंभ होने के समय के आस-पास प्रतिपादित इस दर्शन में मुख्यतया तर्क विद्या को प्रधानता दी गई है। इसके अनुसार सत्य या वास्तविकता का ज्ञान ही मोक्ष दिला सकता है। न्याय में प्रमाण और प्रमैया का विवरण है यानी वह, जिसे प्रमाणित किया जागा है। इसमें इस विचार को मान्यता दी गई है कि आत्मा शाश्वत है और ईश्वर एवं सृष्टि के समानांतर उसका भी
अस्तित्व है।
शरीयत
मुस्लिम कानूनों का समुच्चय, जो अल्लाह के हुक्म पर आधारित है और इसमें अन्य कई श्रोतों का भी योगदान है जैसे कुरान, पैगम्बर मुहम्मद के उपदेश और मुस्लिम समुदाय की सर्वसहमति। इसी को आधार मान सभी मसले हल किए जाते हैं।
तांत्रिक मत
यह हिंदू धर्म और बौद्ध धर्म में उपासना का एक रूप है। हिंदुओं में इसमें तंत्रमंत्र के सहारे शिव-शक्ति की पूजा की जाती है। बौद्धों में इसे वज्रयान के नाम से जागा जाता है। इसी से हठयोग, मंत्र एवं तांत्रिक आचारों की प्रधानता हुई। कतिपय वैष्णव, शैव पंथों में तंत्र-मंत्र के माध्यम से शरीर की प्रमुखता बताते हुए करतब किए जाते हैं।
तीर्थंकर
जैनियों के धर्म गुरु तीर्थंकर कहलाते हैं। दुनिया की बुराइयों से ऊपर उठ चुके ये गुरु जैन धर्म में एक लम्बी शृंखला बनाते हैं। कुल 24 तीर्थंकर हुए हैं। इनमें वर्धमान महावीर 24वें थे। इन्होंने आवागमन के चक्र से मुक्ति एवं आत्मा को कलुषित होने से बचाने के कई माग्र बताए, जिन पर चलकर मनुष्य कैवल्य प्राप्त कर सकता है। इनके धर्म ग्रंथ कल्पसूत्र में इन तीर्थंकरों का वर्णन है।
उर्स
मुस्लिम संतों की पुण्यतिथि पर उनकी मजार पर मनाए जागे वाले उत्सव को उर्स कहा जाता है। इस मौके पर कुरान की आयतें पढ़ी जाती हैं, कव्वाली गाई जाती है और फूल व चादरें चढ़ाई जाती हैं।
उत्तर मीमांसा
सामान्य रूप से वेदांत के नाम से ज्ञात यह हिंदू दर्शन की 6 शाखाओं में से एक है। बादरायण के ब्रह्मसूत्र पर आधारित यह शाखा उपनिषदों के महत्व पर जोर देती है। इसमें प्रयास किया गया है कि उपनिषद् के ज्ञान को ठोस व सरल रूप् दिया जाए। ब्रह्मसूत्र की गूढ़ एवं दुर्बोध सूक्तियों के कारण ही शंकर के ‘अद्वैत’, रामानुज के ‘विशिष्टाद्वैत’ और माधव के ‘द्वैत’ जैसी व्याख्याएं जन्मी थीं।
वैशेषिक
कनाद द्वारा प्रतिपादित हिंदू दर्शन की यह शाखा न्याय दर्शन के काफी गजदीक है। यह शाखा उस ब्रह्माण्ड की व्याख्या करती हुई परमाणुवाद की पद्धति पर आधारित है, जिसमें आत्मा लिप्त है। सांख्य की भांति वैशेषिक का भी मानना है कि आत्मा ब्रह्मांड से भिन्न है और इसकी मुक्ति इस भिन्नता को समझकर ही हो सकती है। संसार के आणविक चरित्र को समझने में पहला चरण यह है कि यह अणुओं की निरंतर परिवर्तित होने वाली संश्लिष्ट प्रक्रिया है, जो किन्हीं सिद्धांतों के अनुसार एकजुट या अलग होते हैं। ब्रह्मचक्र की समाप्ति पर ये अणु पूर्ण संतुलन की स्थिति में आ जाते हैं।
विशिष्टाद्वैत
12वीं शताब्दी में रामानुज ने शंकराचार्य से अलग वेदांत की व्याख्या भिन्न ढंग से करते हुए भक्ति को दार्शनिक आधार प्रदान किया। उन्होंने विशिष्टाद्वैत का प्रतिपादन किया और ईश्वर की अवधारणा को इष्टदेव के रूप में रखा। उनके अनुसार सर्वशक्तिमान भगवान विष्णु ने अपने अंश से इस ब्रह्माण्ड की रचना की और चूंकि सृष्टिकर्ता ने ही इसे बनाया है तो यह शून्य कैसे हो सकता है। इसी प्रकार उन्होंने आत्मा बनाई। परमानंद की स्थिति में भी यह अपना अस्तित्व नहीं खो सकती क्योंकि यदि मुक्ति का माग्र तलाशना है तो समर्पण
आवश्यक है।
योग
ऋषि याज्ञवल्क्य द्वारा प्रस्तुत और बाद में पातंजलि द्वारा व्यवस्थित की गई हिंदू दर्शन की योग शाखा ने उस कमी को पूरा किया, जिसे सांख्य दर्शन ने अधूरा छोड़ दिया था। योग के मनोविज्ञान और ज्ञान के सिद्धांत सांख्य दर्शन में से लिए गए हैं। उसके समान इसका उद्देश्य है कि मनुष्य की आत्मा प्रकृति के बंधन से मुक्त हो और सत्य की अनुभूति तथा मन की परम शांति प्राप्त करे; जिसे वह योग कहता है। प्रार्थना और आध्यात्मिक साधना इसके माग्र हैं। इस आध्यात्मिक प्रशिक्षण के समय एक ऐसी अवस्था आती है, जब योगी सर्वोच्च शक्ति प्राप्त कर लेता है। उसके बल पर वह पृथ्वी और आकाश, भूत और भविष्य के बारे में सब कुछ जाग सकता है, स्वयं को अदृश्य कर सकता है, हवा में उड़ सकता है और पानी पर चल सकता है। उसका ध्येय पूर्ण अनासक्ति व पूर्ण शांति प्राप्त करना है।

मुसलमान सम्प्रदाय
मुसलमान कई सम्प्रदाय तथा उपसम्प्रदाय में विभाजित हैं। भारत में सुन्नी, शिया, बोहरा, अहमदिया कुछ बड़े सम्प्रदाय हैं। ये सम्प्रदाय उपसम्प्रदायों में विभक्त हैं। वहाबियों को सुन्नियों का उपसम्प्रदाय माना जाता है। इस्माईली बोहरा सम्प्रदाय का एक अंग है। इनमें से अधिकांश सम्प्रदाय कुछ व्यक्तियों के इर्द-गिर्द पंथ के रूप में विकसित हुए थे। लेकिन समय के साथ-साथ वे सम्प्रदाय में बदलते
चले गए। यहां हम सम्पूर्ण विश्व में फैले दो प्रमुख सम्प्रदायों सुन्नी या शिया का संक्षिप्त परिचय देने जा रहे हैं। सुन्नी अपने को सुन्नी (पैगम्बर की परंपरा) का अनुयायी मानते हैं। वे अब हनीफा, मलिक, अबुल, अनस, अश शाफी, और अहमद बिन हम्बल जैसे विद्वानों या इमामों द्वारा प्रस्तुत चार प्रमुख इस्लामी विचारों का अनुकरण करते हैं। सुन्नी हजरत अब वक्र, उमर, उस्मान और अली की खिलाफ़त परम्परा और क्रम को भी उचित और सही ठहराते हैं। वे पैगम्बर के सिवा किसी अन्य को आध्यात्मिक गुरु या पथ प्रदर्शक के रूप में स्वीकार नहीं करते हैं। वे केवल कुरान और हदीस (पैगम्बर के वचन) पर ही विश्वास करते हैं।
शिया और सुन्नियों में पैगम्बर के बाद उत्तराधिकारी के रूप में हजरत अली को ही स्वीकार किया जाता है। शिया पैगम्बर के बाद धार्मिक और आध्यात्मिक नेता के रूप में इमामों की परम्परा को भी स्वीकार करते हैं। शिया अली को पहला इमाम मानते हैं और वे 128 इमामों की शृंखला में विश्वास करते हैं। इन आधारभूत मतभेदों के अतिरिक्त व्याख्या संबंधी मतभेद भी सामने आ गए हैं और शिया संप्रदाय इस्लाम धर्म के एक प्रमुख सम्प्रदाय के रूप में विकसित हुआ है।
बौद्ध सम्प्रदाय
गौतम बुद्ध के बाद धार्मिक सम्प्रदाय और आस्था के प्रश्न पर कई बौद्ध परिषदें आयोजित की गईं। इससे दो प्रमुख विचारधाराओं का उदय हुआ।
वैशाली में 383 ई.प. में द्वितीय बौद्ध साबकमीर कालशोक की अध्यक्षता में सभा आयोजित हुई। इसमें नियमों में कुछ शिथिलता लाई गई। परिणामस्वरूप, बौद्धमत का दो सम्प्रदायों में विभाजन हो गया स्थविर और महासंघिक। स्थविरवादी धीरे-धीरे गयारह सम्प्रदायों और महासंघिक सात सम्प्रदायों में बंट गए। ये अठारह सम्प्रदाय हीनयान मत में संगठित हुए। स्थविरवादी कठोर भिक्षुक जीवन और मूल निर्देशित कड़े अनुशासित नियमों का अनुसरण करते थे। वह समूहए जिसने संशोधित नियमों को मानाए महासंघिक कहलाया।
महायान सम्प्रदाय का विकास चैथी बौद्ध सभा के बाद हुआ। हीनयान सम्प्रदाय जो बुद्ध की रूढ़िवादी शिक्षा में विश्वास करता था, का जिस गुट ने विरोध किया और जिन्होंने नए विचार अपना, वे लोग महायान के समर्थक कहलाए। उन्होंने बुद्ध की प्रतिमा बनाई और ईश्वर की भांति उसकी पूजा की। प्रथम सदी ई. में कनिष्क के शासनकाल में कुछ सैद्धांतिक परिवर्तन किए गए।